कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ५९ | विवाहसंयुक्तं; शुश्रूषाभर्मपारुष्य- |
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| अध्याय ३ | द्वेषातिचारोपकारव्यवहारप्रतिषेधाश्च; |
(१) द्वादशवर्षा स्त्री प्राप्तव्यवहारा भवति, षोडशवर्षः पुमान् । अत ऊर्ध्वमशुश्रूषायां द्वादशपणः स्त्रिया दण्डः, पुंसो द्विगुणः ।
(२) भर्मण्यायामनिर्दिष्टकालायां ग्रासाच्छादनं वाधिकं यथापुरुष-परिवापं सविशेषं दद्यात् । निर्दिष्टकालायां तदेव सङ्ख्याय । बन्धं च दद्यात् । शुल्कस्त्रीधनाधिवेदनिकानामनादाने च ।
(३) श्वशुरकुलप्रविष्टायां विभक्तायां वा नाभियोज्यः पतिः । इति भर्म ।
(४) नग्ने, विनग्ने, न्यङ्गे, अपितृके, अमातृके, इत्यनिर्देशेन विनय-ग्रहणम् । वेणुदलरज्जुहस्तानामन्यतमेन वा पृष्ठे त्रिराघातः । तस्यातिक्रमे वाग्दण्डपारुष्यदण्डाभ्यामर्धदण्डाः ।
विवाह सम्बन्ध
स्त्री की परवरिश : कठोर स्त्री के साथ व्यवहार : पति-पत्नी का द्वेष : पति पत्नी का अतिचार : और अतिचार पर प्रतिषेध
( १ ) बारह वर्ष की लड़की और सोलह वर्ष का लड़का कानूनन बालिग माने जाते हैं । इस उम्र के बाद यदि वे राज-नियम का उल्लंघन ( अशुश्रूषा ) करें तो लड़की को बारह पण और लड़के को चौबीस पण का दण्ड दिया जाय ।
( २ ) स्त्री की परवरिश : यदि किसी स्त्री के भरण-पोषण ( भर्म ) की अवधि नियत न हो तो पुरुष को चाहिए कि वह उस स्त्री के वस्त्र, भोजन और व्यय का यथोचित प्रबन्ध करे; अथवा अपनी आमदनी के अनुसार उसको अतिरिक्त सुख-सुविधा भी दे; किन्तु जिस स्त्री के भरण-पोषण का समय नियत हो और जिस स्त्री ने दहेज, स्त्री धन तथा अतिरिक्त धन लेना स्वीकार न किया हो, पति को चाहिए कि अपनी आमदनी के अनुसार उसको बँधी हुई रकम देता जाय ।
( ३ ) यदि स्त्री अपने मायके में रहती हो या स्वतन्त्र रह कर गुजारा करती हो, तो उसके भरण-पोषण के लिए पति को बाध्य नहीं किया जा सकता है । यहाँ तक स्त्री की परवरिश पर विचार किया गया ।
( ४ ) कठोर स्त्री के साथ व्यवहार : दाम्पत्य-नियमों का उल्लंघन करने