कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) मानुषहीनो ज्येष्ठस्तृतीमंशं ज्येष्ठांशाल्लभेत, चतुर्थमन्यायवृत्तिनिवृत्तधर्मकार्यो वा। कामचारः सर्वं जीयेत। (२) तेन मध्यमकनिष्ठौ व्याख्यातौ। तयोर्मानुषोपेतो ज्येष्ठांशादधं लभेत। (३) नानास्त्रीपुत्राणां तु संस्कृतासंस्कृतयोः कन्याकृतक्रिययोरभावे च, एकस्याः पुत्रयोर्यमयोर्वा पूर्वजन्मना ज्येष्ठभावः। (४) सूतमागधव्रात्यरथकाराणामैश्वर्यतो विभागः, शेषास्तमुपजीवेयुः। अनीश्वराः समविभागा इति। (५) चातुर्वर्ण्यपुत्राणां ब्राह्मणीपुत्रश्चतुरोंऽशान् हरेत्, क्षत्रियापुत्र-स्त्रीनंशान्, वैश्यापुत्रो द्वावंशौ, एकं शूद्रापुत्रः। (६) तेन त्रिवर्णद्विवर्णपुत्रविभागः क्षत्रियवैश्ययोर्व्याख्यातः।
( १ ) बड़ा लड़का यदि नपुंसक हो तो उसे अपने हिस्से में से तीसरा हिस्सा, यदि वह चरित्रहीन हो तो चौथा हिस्सा और यदि धर्मकार्यों से दूर रहता हो तथा स्वेच्छाचारी हो तो पैतृक सम्पत्ति का उसे कुछ भी उत्तराधिकार नहीं मिलना चाहिए।
( २ ) ऐसी अवस्था में मझले और छोटे लड़कों के सम्बन्ध में यही नियम समझना चाहिए। इन दोनों में यदि एक नपुंसक न हो तो वह बड़े भाई के हिस्से में से आधी बाँट ले ले।
( ३ ) अनेक स्त्रियों से उत्पन्न पुत्रों में उसी के पुत्रको बड़ा समझा जाय, जो अविवाहित स्त्री के मुकाबले में, विधिपूर्वक व्याहं करके लाई गई है, भले ही उसका पुत्र पीछे पैदा हुआ हो; यदि एक स्त्री कन्या की अवस्था में ही पत्नी बनी और दूसरी स्त्री दूसरों द्वारा भोगी जाने पर पत्नी बनी, तो उनमें से पहिली का लड़का ही बड़ा समझा जाय। इसी प्रकार यदि किसी स्त्री के जुड़वाँ बच्चे पैदा हो जायें, तो उनमें वही बड़ा माना जाय जो पहिले पैदा हुआ है।
( ४ ) सूत, मागध, व्रात्य और रथकारों की सम्पत्ति का विभाग उनके ऐश्वर्य के अनुसार होना चाहिए, अर्थात् जो लड़का उनमें अधिक प्रभावशाली है वह पैतृक सम्पत्ति को ले ले और उसके बाकी भाई उस पर आश्रित रहकर जीवित रहें। यदि उनमें से कोई एक अधिक प्रभावशाली न हो तो वे सम्पत्ति का बराबर-बराबर बाँट करें।
( ५ ) यदि किसी ब्राह्मण की चारों वर्णों की पत्नियां हों तो ब्राह्मणी से पैदा हुए पुत्र को चार भाग, क्षत्रिया स्त्री के पुत्र को तीन भाग, वैश्या पत्नी के लड़के को दो भाग और शूद्रा में उत्पन्न हुए पुत्र को एक भाग मिलना चाहिए।
( ६ ) इसी प्रकार यदि किसी क्षत्रिय की क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा, तीन पत्नियां