कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ६३
अध्याय ७
दायविभागे पुत्रविभागः
(१) परपरिग्रहे बीजमुत्सृष्टं क्षेत्रिणः, इत्याचार्याः ।
(२) माता भस्त्रा यस्य रेतस्तस्यापत्यम्, इत्यपरे ।
(३) विद्यमानमुभयम्, इति कौटिल्यः ।
(४) स्वयंजातः कृतक्रियायामौरसः । तेन तुल्यः पुत्रिकापुत्रः । सगोत्रेणान्यगोत्रेण वा नियुक्तेन क्षेत्रजातः क्षेत्रजः पुत्रः । जनयितुरसत्यन्यस्मिन् पुत्रे स एव द्विपतृको द्विगोत्रो वा द्वयोरपि स्वधारिक्थभाग् भवति । तत्सधर्मा बन्धूनां गृहे गूढजातस्तु गूढजः । बन्धुनोत्सृष्टोऽपविद्धः संस्कर्तुः पुत्रः। कन्यागर्भः कानीनः । सगर्भोढाया सहोढः । पुनर्भूतायाः पौनर्भवः ।
दाय विभाग
पुत्रक्रम से उत्तराधिकार
( १ ) पुरातन आचार्यों का मत है कि ‘किसी पुरुष से किसी पराई स्त्री में पैदा हुआ पुत्र उस पराई स्त्री की संपत्ति है’।
( २ ) किन्तु दूसरे आचार्यों का कहना है कि ‘जो बच्चा जिसके वीर्य से पैदा हो वह उसी का समझा जाना चाहिए।’
( ३ ) आचार्य कौटिल्य की स्थापना है कि ‘वे दोनों ही उस बालक के पिता समझे जाँय।’
( ४ ) विधिपूर्वक विवाहित स्त्री से उसके पति द्वारा पैदा किया हुआ पुत्र औरस कहलाता है । उसी के समान लड़की का लड़का भी समझा जाता है । समानगोत्र अथवा भिन्नगोत्र स्त्री से उसके पति द्वारा पैदा किया गया लड़का क्षेत्रज कहलाता है । यदि मृतक पिता का कोई लड़का न हो तो वही, ( दो पिता या दो गोत्र वाला लड़का ही ) उन दोनों के पिंडदान और संपत्ति, का उत्तराधिकारी होता है । क्षेत्रज पुत्र की ही तरह जो बच्चा छिपे तौर पर स्त्री के किसी भाई-बन्धु के घर पैदा हो वह गूढज कहलाता है । यदि बन्धु-बान्धव उस बच्चे को अपने यहाँ न रखना चाहें और मारकर कहीं डाल दें या फेंक दें, उस दशा में जो उस बच्चे का पालन-पोषण करे वह पुत्र उसी का माना जाता है । अविवाहित कन्या के गर्भ से जो बच्चा पैदा हो उसे कानीन कहते है । गर्भवती स्त्री का विवाह होने पर जो बच्चा पैदा हो वह सहोढ कहलाता है । दुबारा व्याहता स्त्री से जो बच्चा पैदा हो उसे पौनर्भव कहते हैं ।