भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ६३ : अ० ७ ] दायविभाग ( ३ ) २८३

(१) स्वयंजातः पितृबन्धूनां च दायादः । परजातः संस्कर्तुरेव न बन्धूनाम् । (२) तत्सधर्मा मातृपितृभ्यामद्भिर्दत्तो दत्तः । (३) स्वयं बन्धुभिर्वा पुत्रभावोपगत उपगतः । (४) पुत्रत्वेऽधिकृतः कृतकः । परिक्रीतः क्रीत इति । (५) औरसे तूत्पन्ने सवर्णास्तृतीयांशहराः । असवर्णा ग्रासाच्छादन-भागिनः । (६) ब्राह्मणक्षत्रिययोरनन्तरा पुत्राः सवर्णाः, एकान्तरा असवर्णाः । (७) ब्राह्मणस्य वैश्यायामम्बष्ठः, शूद्रायां निषादः पारशवो वा । क्षत्रियस्य शूद्रायामुग्रः । (८) शूद्र एव वैश्यस्य ।


( १ ) पिता या बन्धुओं से स्वयं उत्पन्न किया हुआ बच्चा उनकी संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है । जो पुत्र गूढज पुत्र के समान दूसरे से पैदा हुआ हो, वह अपने पालन-पोषण करने वाले की संपत्ति का ही उत्तराधिकारी होता है; बन्धु-बान्धवों की संपत्ति का नहीं ।

( २ ) उक्त बालक के ही समान जो बालक माता-पिता के द्वारा, हाथ में जल लेकर, किसी दूसरे को दे दिया जाय वह दत्त कहलाता है; और पालन करने वाले की संपत्ति का वह उत्तराधिकारी होता है ।

( ३ ) जो स्वयं या बन्धुओं द्वारा पुत्र भाव से प्राप्त हुआ हो, वह उपगत कहलाता है ।

( ४ ) जो पुत्रभाव से स्वीकार किया जाय वह कृतक कहलाता है । जो खरीद कर पुत्र बनाया जाय उसको क्रीत पुत्र कहते हैं ।

( ५ ) औरस पुत्र के उत्पन्न होने पर अन्य सवर्ण स्त्रियों से उत्पन्न पुत्र, पिता की जायदाद के तीसरे हिस्से के अधिकारी होते हैं । असवर्ण स्त्रियों से उत्पन्न पुत्र केवल भोजन-वस्त्र के ही अधिकारी हैं ।

( ६ ) ब्राह्मण और क्षत्रिय के अनन्तर (ब्राह्मण के लिए क्षत्रिय और क्षत्रिय के लिए वैश्य) जाति की स्त्री से उत्पन्न पुत्र सवर्ण और एक जाति के व्यवधान से, अर्थात् ब्राह्मण से वैश्या में या क्षत्रिय से शूद्रा में, उत्पन्न पुत्र असवर्ण समझे जाते हैं ।

( ७ ) ब्राह्मण से वैश्या में उत्पन्न पुत्र अम्बष्ठ कहलाता है । ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र निषाद या पारशव कहलाता है । क्षत्रिय से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र उग्र कहलाता है ।

( ८ ) वैश्य से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र शूद्र ही माना जायेगा ।