भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२८४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ तीसरा अधिकरण

(१) सवर्णासु चैषामचरितव्रतेभ्यो जाता व्रात्याः । इत्यनुलोमाः ।
(२) शूद्रादायोगवक्षत्तृचण्डालाः ।
(३) वैश्यान्मागधवैदेहकौ ।
(४) क्षत्रियात् सूतः ।
(५) पौराणिकस्त्वन्यः सूतो मागधश्च; ब्रह्मक्षत्राद्विशेषतः ।
(६) त एते प्रतिलोमाः स्वधर्मातिक्रमाद् राज्ञः सम्भवन्ति ।
(७) उग्रान्नैषाद्यां कुक्कुटकः, विपर्यये पुल्कसः । वैदेहिकायामम्बष्ठाद् वेणः, विपर्यये कुशीलवः । क्षत्तायामुग्राच्छ्वपाकः । इत्येतेऽन्ये चान्तरालाः । कर्मणा वैण्यो रथकारः ।
(८) तेषां स्वयोनौ विवाहः । पूर्वावरगामित्वं वृत्तानुवृत्तं च स्वधर्मान् स्थापयेत् । शूद्रसधर्माणो वा अन्यत्र चण्डालेभ्यः ।


( १ ) ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्वारा सवर्णा स्त्रियों में उत्पन्न पुत्रों का यदि यथासमय विधिपूर्वक उपनयन एवं ब्रह्मचर्य आदि संस्कार न किया जाय तो वे व्रात्य हो जाते हैं । ये सब अनुलोम विवाहों से पैदा होते हैं ।

( २ ) शूद्र द्वारा वैश्या, क्षत्रिया तथा ब्राह्मणी स्त्रियों में उत्पन्न पुत्र क्रमशः आयोगव, क्षत्ता और चाण्डाल कहलाते हैं ।

( ३ ) वैश्य द्वारा क्षत्रिया तथा ब्राह्मणी में उत्पन्न पुत्र क्रमशः मागध और वैदेहक कहलाते हैं ।

( ४ ) क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी में उत्पन्न पुत्र सूत कहलाता है ।

( ५ ) किन्तु पुराणों में वर्णित सूत और मागध इनसे सर्वथा भिन्न हैं और वे ब्राह्मण तथा क्षत्रियों से भी श्रेष्ठ हैं ।

( ६ ) राजा जब धर्मभ्रष्ट हो जाता है तभी ये प्रतिलोम वर्णसंकर सन्तानें पैदा होती हैं ।

( ७ ) क्षत्रिय-शूद्रा से उत्पन्न उग्र पुरुष द्वारा निषाद जाति की स्त्री में उत्पन्न बालक कुक्कुट कहलाता है । निषाद पुरुष से उग्रा स्त्री में उत्पन्न पुत्र पुल्कस कहलाता है । अम्बष्ठ पुरुष से वैदेहिका स्त्री में उत्पन्न पुत्र वैण कहलाता है । वैदेहक पुरुष से अम्बष्ठा स्त्री में उत्पन्न पुत्र कुशीलव कहलाता है । इसी प्रकार उग्र-क्षत्ता से श्वापाक आदि अवान्तर संकर जातियों के सम्बन्ध में समझना चाहिए । वैण्य; कर्म करने से रथकार कहा जाता है ।

( ८ ) उक्त संकर वर्णों का विवाह अपनी ही जाति में होता है । पूर्वापरगामी होने तथा धर्म का निर्णय करने में वे अपने पूर्वजों का अनुगमन करें । अथवा चाण्डालों को छोड़कर सभी संकर जातियों का धर्म, शूद्रों के ही समान समझना चाहिये ।