भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ६३ : अ० ७ ] दाय विभाग ( ३ ) २८५

( १ ) केवलमेवं वर्तमानः स्वर्गमाप्नोति राजा नरकमन्यथा । ( २ ) सर्वेषामन्तरालानां समो विभागः । ( ३ ) देशस्य जात्याः सङ्घस्य धर्मो ग्रामस्य वापि यः । उचितस्तस्य तेनैव दायधर्मं प्रकल्पयेत् ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दायविभागे पुत्रविभागो नाम सप्तमोऽध्यायः, आदितस्त्रिषष्टितमोऽध्यायः ।

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( १ ) प्रजा की सुव्यवस्था का यही एकमात्र विधान है, जिसको करने पर राजा स्वर्ग जाता है; अन्यथा उसको नरक होता है ।

( २ ) इन सभी संकर जातियों में जायदाद का बराबर-बराबर हिस्सा होना चाहिए ।

( ३ ) देश, जाति, संघ और गाँव के लिए जैसा धर्मोचित एवं श्रेयस्कर हो, उसी के अनुसार वहाँ का दाय-विभाग करना चाहिए ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दायविभाग-पुत्रविभाग नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।

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