कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ६४ | वास्तुके गृहवास्तुकम् |
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| अध्याय ८ |
(१) सामन्तप्रत्यया वास्तुविवादाः ।
(२) गृहं क्षेत्रमारामः सेतुबन्धस्तटाकमाधारो वा वास्तुः ।
(३) कर्णकीलायससम्बन्धोऽनुगृहं सेतुः । यथासेतुभोगं वेश्म कारयेत् ।
(४) अभूतं वा परकुड्यादपक्रम्य द्वावरत्नी त्रिपदीं पादे बन्धं कारयेत् ।
(५) अवस्करं भ्रममुदपानं वा न गृहोचितमन्यत्र अन्यत्र सूतिकाकूपादानिर्दशाहादिति । तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ।
(६) तेनेन्धनावघातनकृतं कल्याणकृत्येष्वाचामोदकमार्गाश्च व्याख्याताः ।
वास्तुक
गृह-निर्माण
( १ ) गाँव के मुखियाओं ( सामन्तों ) को चाहिए कि वे वास्तु-विषयक झगड़ों का फैसला करें ।
( २ ) घर, खेत, बाग-बगीचे, सीमावंध, तालाब और वाँध आदि सब वास्तु कहलाते हैं ।
( ३ ) प्रत्येक घर के चारों ओर चारों कोनों पर लोहे के छोटे खम्भे गाड़कर उनमें जो तार खींच दिया जाता है, उसी का नाम सेतु ( सीमा ) है । सीमा ( सेतु ) के अनुसार ही मकान बनवाना चाहिए ।
( ४ ) दूसरे की दीवार के सहारे मकान न बनवाया जाय । मकान की नींव में सवा फुट या तीन पद ( दो अरत्नी ) कंकरीट भरवानी चाहिए ।
( ५ ) दस दिन के लिए बनाये जाने वाले सूतिकागृह को छोड़कर, बाकी सब मकानों में पाखाना, पाइप, कुआँ, पाकशाला और भोजनशाला अवश्य बनवाने चाहिए । इस नियम का उल्लंघन करने वाले को पूर्व साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ६ ) इसी प्रकार उत्सवों के समय कुल्ले का पानी बाहर निकालने के लिए नालियों और भट्टियों का प्रबन्ध भी हर मकान में रहना चाहिए ।