भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) परकुड्यमुदकेनोपघ्नतो द्वादशपणो दण्डः। मूत्रपुरीषोपघाते द्विगुणः। (२) प्रणालीमोक्षो वर्षति, अन्यथा द्वादशपणो दण्डः। (३) प्रतिषिद्धस्य च वसतः। निरस्यतश्चावक्रयणम्, अन्यत्र पारुष्यस्तेयसाहससङ्ग्रहणमिथ्याभोगेभ्यः। स्वयमभिप्रस्थितो वर्षावक्रयशेषं दद्यात्। (४) सामान्ये वेश्मनि साहाय्यमप्रयच्छतः सामान्यमुपरुन्धतो भोगं च गृहे द्वादशपणो दण्डः, विनाशयतस्तद्द्विगुणः। (५) कोष्ठकाङ्गणवर्जनामग्निकुट्टनशालयोः । विवृतानां च सर्वेषां सामान्यो भोग इष्यते ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके गृहवास्तुकं नाम अष्टमोऽध्यायः, आदितश्चतुष्षष्टितमः।

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अपने पड़ोसियों को कष्ट पहुँचावे, सहन को रोके और पानी निकालने का ठीक प्रबन्ध न करे तो वह भी पूर्व साहस दण्ड का भागीदार है।

(१) पानी आदि से जो दूसरे की दीवाल को नुकसान पहुँचाये उसे बारह पण दण्ड दिया जाय। पेशाब और पाखाने की रुकावट करने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाय।

(२) कूड़ा-करकट बहने के लिये वर्षा-ऋतु में हरेक नाली खुली रहनी चाहिए; अन्यथा उसको बारह पण दण्ड दिया जाय।

(३) मालिक मकान के मना करने पर भी जो किरायादार मकान खाली न करे और किराया देने पर भी जो मकान मालिक किरायेदार को निकाले, उन्हें बारह पण दण्ड दिया जाय; बशर्ते कि उनके सम्बन्ध में कठोर भाषण, चोरी, डाका, व्यभिचार तथा धोखाधड़ी का कोई मामला न हो। यदि किरायेदार स्वेच्छा से मकान को छोड़ दे तो साल भर का किराया मालिक को अदा करे।

(४) धर्मशाला आदि पंचायती घरों में सहायता न देने वाले व्यक्ति को तथा उन घरों का उपयोग करने में बाधा डालने वाले व्यक्ति को बारह पण दण्ड दिया जाय। यदि कोई उन पञ्चायती घरों की क्षति करे तो उस पर चौबीस पण जुर्माना किया जाय।

(५) कोठा और आँगन को छोड़कर अग्निशाला, कुट्टनशाला (ओखली) तथा दूसरे सभी खुले स्थानों का सब लोग उपयोग कर सकते हैं।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में आठवाँ अध्याय समाप्त।

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