कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ६५ | # वास्तुके वास्तुविक्रयः |
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| अध्याय ९ |
(१) ज्ञातिसामन्तधनिकाः क्रमेण भूमिपरिग्रहान् क्रेतुमभ्याभवेयुः । ततोऽन्ये बाह्याः ।
(२) सामन्तचत्वारिंशत्कुल्या गृहप्रतिमुखे वेश्म श्रावयेयुः । सामन्त-ग्रामवृद्धेषु क्षेत्रमारामं सेतुबन्धं तटाकमाधारं वा मर्यादासु यथासेतुभोगम् । 'अनेनार्घेण कः क्रेता' इति त्रिराघुषितमव्याहतं क्रेता क्रेतुं लभेत ।
(३) स्पर्धया वा मूल्यवर्धने मूल्यवृद्धिः सशुल्का कोशं गच्छेत् । विक्रय-प्रतिक्रोष्टा शुल्कं दद्यात् ।
(४) अस्वामिप्रतिक्रोशे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । सप्तरात्रादूर्ध्वमनभि-
वास्तुक
मकान बेचना, सीमाविवाद, खेतों की सीमाएँ, मिश्रित विवाद, कर की छूट
(१) मकान बेचना—यदि मकान बेचना हो तो मकान मालिक को चाहिए कि क्रमशः वह अपने कुटुम्बी, गाँव का मुखिया और धनाढ्य से पूछे । यदि वे खरीदने से इनकार कर दें तब बाहर के लोगों से बातचीत चलायी जाय ।
(२) दूसरे गाँवों के मुखिया तथा उनके चालीस कुल तक के पुरुषों को, मकान के सामने ही मकान की कीमत सुनाई जाय । गाँव के मुखिया तथा अन्य वृद्ध पुरुषों के सामने खेत, बाग, सीमबन्ध, तालाब और हौज आदि की मर्यादा के अनुसार कीमत निर्धारित करे 'इस मकान की इतनी कीमत है; इसको कौन खरीदना चाहता है ?' इस प्रकार तीन बार आवाज लगाने पर जो भी खरीदार बोली बोले, उसको बेरोक-टोक मकान बेच देना चाहिए ।
(३) खरीददारों की होड़ के कारण बोली बढ़ जाय तो वह बढ़ा हुआ मूल्य शुल्क सहित सरकारी खजाने में जमा किया जाय । बेचने वाले से वह शुल्क वसूल किया जाय ।
(४) मकान मालिक की अनुपस्थिति में उसके मकान का नीलाम करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । सूचना देने पर भी सात दिन के भीतर यदि
१९ कौ०