कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ६६ | वास्तुके विवीतक्षेत्रपथहिंसा |
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| अध्याय १० | समयस्यानपाकर्म च |
(१) कर्मोदकमार्गमुचितं रुन्धतः कुर्वतोऽनुचितं वा पूर्वः साहसदण्डः । (२) सेतुकूपपुण्यस्थानचैत्यदेवायतनानि च परभूमौ निवेशयतः पूर्वा- नुवृत्तं धर्मसेतुमाधानं विक्रयं वा नयतो नाययतो वा मध्यमः साहसदण्डः श्रोतॄणामुत्तमः अन्यत्र भग्नोत्सृष्टात् । (३) स्वाम्यभावे ग्रामाः पुण्यशीला वा प्रतिकुर्युः । (४) पथिप्रमाणं दुर्गनिवेशे व्याख्यातम् । क्षुद्रपशुमनुष्यपथं रुन्धतो द्वादशपणो दण्डः । महापशुपथं चतुर्विंशतिपणः । हस्तिक्षेत्रपथं चतुष्पञ्चा- शत्पणः । सेतुवनपथं षट्छतः । श्मशानग्रामपथं द्विशतः । द्रोणमुखपथं पञ्चशतः । स्थानीयराष्ट्रविवीतपथं साहस्रः । अतिकर्षणे चैषां दण्डचतुर्था दण्डाः । कर्षंणे पूर्वोक्ताः ।
वास्तुक
रास्तों का रोकना; गावों का बन्दोबस्त; चरागाहों का प्रबन्ध;
सामूहिक कार्यों में शामिल न होने का मुआवजा
( १ ) जो लोग खेती की सिंचाई के लिए पानी के उचित रास्तों को रोकें और अनुचित रास्तों से जल को ले जायें उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( २ ) जो लोग दूसरे की जमीन में सीमा, पुण्यस्थान, चैत्य और देवालय बनवायें अथवा पहिले से धर्मार्थ बने हुए स्थानों को गिरबी रखें, बेचें या बिकवायें उन्हें मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । जो लोग इन कार्यों में सहायक या साक्षी बनें उन्हें उत्तम साहस दण्ड दिया जाय; किन्तु, यदि मकान टूट-फूट गया हो और उसको मालिक ने छोड़ दिया हो तो उसको बेचने, गिरबी रखने में कोई हानि नहीं है ।
( ३ ) मकान मालिक के न होने पर ग्रामवासी तथा अन्य धार्मिक लोग उस टूटे-फूटे धर्मार्थ मकान की मरम्मत कर सकते हैं ।
( ४ ) **रास्तों का रोकना—**आने-जाने के लिए रास्ता कितना चौड़ा होना चाहिए, इसका निरूपण 'दुर्ग-निवेश' प्रकरण में कर दिया गया है । जो भी व्यक्ति छोटे-छोटे जानवरों और मनुष्यों के रास्ते को रोके उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । बड़े-बड़े पशुओं का मार्ग रोकने पर चौबीस पण; हाथी का तथा खेतों का रास्ता रोकने पर चौवन पण; सेतु एवं जङ्गल का रास्ता रोकने पर छह-सौ पण; श्मशान तथा गांव का रास्ता रोकने पर दो-सौ पण; द्रोणमुख का रास्ता रोकने पर