कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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प्र० ६५ : अ० ९ ] वास्तुक ( २ ) २९३
(१) सेतुभ्यो मुञ्चतस्तोयमवारे षट्पणो दमः । वारे वा तोयमन्येषां प्रमादेनोपरुन्धतः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके वास्तुविक्रयो नाम नवमोऽध्यायः, आदितः पञ्चषष्टितमः ।
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( १ ) अपनी बारी न होने पर जो पानी ले उसको छह पण का दण्ड दिया जाय, और उसको भी यही दण्ड दिया जाय तो प्रमाद से, अपनी बारी पर पानी लेते हुए दूसरे का पानी रोक दे ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में वास्तुविक्रय नामक नौवां अध्याय समाप्त
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