भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) प्रेक्षायामनंशदः सस्वजनो न प्रेक्षेत । प्रच्छन्नश्रवणेक्षणे च सर्वहिते च कर्मणि निग्रहेण द्विगुणमंशं दद्यात् ।
(२) सर्वहितमेकस्य ब्रुवतः कुर्युराज्ञाम् । अकरणे द्वादशपणो दण्डः । तं चेत्सम्भूय वा हन्युः पृथगेषामपराधद्विगुणो दण्डः । उपहन्तृषु विशिष्टः ।
(३) ब्राह्मणतश्चैषां ज्यैष्ठ्यं नियम्येत । प्रवहणेषु चैषां ब्राह्मणेना-कामाः कुर्युः । अंशं च लभेरन् ।
(४) तेन देशजातिकुलसंघानां समयस्यानपाकर्म व्याख्यातम् ।

(५) राजा देशहितान् सेतून् कुर्वतां पथि संक्रमान् ।
ग्रामशोभांश्च रक्षांश्च तेषां प्रियहितं चरेत् ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके प्रकरणे दशमोऽध्यायः,
आदितः षट्षष्टितमः ।

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(१) यदि कोई ग्रामवासी गांव के सार्वजनिक मनोरंजन के कार्यों में अपने हिस्से का चन्दा न दे तो सपरिवार उसको उत्सव में प्रवेश न करने दिया जाय । यदि वे छिपकर तमाशा देखें या सुनें; और जो गाँव के सार्वजनिक हितकारी कार्यों में भाग न ले उससे दुगुना हिस्सा वसूल किया जाय ।

(२) जो व्यक्ति सार्वजनिक कल्याण का सुझाव दे उसकी बात को सभी ग्राम-वासी मानें । उसका तिरस्कार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि गांव के लोग मिलकर उस व्यक्ति को मारें-पीटें तो प्रत्येक ग्रामीण पर अपराध से दुगना दण्ड वसूल किया जाय । जो लोग घातक प्रहार करें उन पर विशेष दण्ड किया जाय ।

(३) उन मारने वालों में यदि ब्राह्मण या उससे भी प्रतिष्ठित कोई व्यक्ति हो तो उसे सबसे अधिक दण्डित किया जाय । यदि किसी सार्वजनिक कार्य में ब्राह्मण सामिल न हो सके तो गाँव के लोग ही उसके अभाव को पूरा कर दें; किन्तु अनु-पस्थित रहने का जो मुआवजा ब्राह्मण की ओर निकले, उसे गाँव वाले अवश्य वसूल कर लें ।

(४) इसी प्रकार देश, जाति, कुल और दूसरे समुदायों की व्यवस्था को समझ लेना चाहिये ।

(५) जो लोग मिलकर जनता के आराम के लिए रास्तों पर मकान बनाते हैं; जो व्यक्ति गांवों को सजाने-सुधारने और उनकी रक्षा करने के लिए यत्नशील रहते हैं उनके सहयोग और कल्याण की ओर राजा का ध्यान रहना चाहिए ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दसवाँ अध्याय समाप्त ।

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