भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ६७ऋणादानम्
अध्याय ११

(१) सपादपणा धर्म्या मासवृद्धिः पणशतस्य । पञ्चपणा व्यावहारिकी । दशपणा कान्तारगाणाम् । विंशतिपणा सामुद्राणाम् । (२) ततः परं कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः । श्रोतॄणामेकैकं प्रत्यर्धदण्डः । (३) राजन्ययोगक्षेमवहे तु धनिकारणिकयोश्चरित्रमवेक्षेत । (४) धान्यवृद्धिः सस्यनिष्पत्तावुपार्धा, परं मूल्यकृता वर्धेत । प्रक्षेपवृद्धिुरुदयादर्धम् । सन्निधानसन्ना वार्षिकी देया । (५) चिरप्रवासः संस्तम्भप्रविष्टो वा मूल्यद्विगुणं दद्यात् । अकृत्वा वृद्धिं साधयतो वर्धयतो वा मूल्यं वा वृद्धिमरोप्य श्रावयतो बन्धचतुर्गुणो


ऋण लेना

(१) व्याज के नियम—सामान्यतया सौ-पण पर सवा-पण व्याज प्रतिमास लिया जाना चाहिए । इसी सौ-पण पर व्यापारी लोगों से पांच पण, जंगल में रहने या वहाँ व्यापार करने वालों से दस पण और समुद्र के व्यापारियों से बीस पण व्याज लेना चाहिए ।

(२) इससे अधिक व्याज लेने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । उसमें जिन्होंने गवाही भरी हो उन्हें आधा दण्ड दिया जाय ।

(३) यदि ऋण देने वाले ( धनिक ) और ऋण लेने वाले ( धारणि ) के आपसी सौदे पर राज्य की भलाई होती हो तो सरकार को उनके चरित्र पर निगरानी रखनी चाहिए ।

(४) यदि अन्नसम्बन्धी व्याज फसल के समय पर चुकता करना हो तो वह मूलधन की आधा रकम से अधिक न होना चाहिए । गोदाम के इकट्ठे बेचे हुए माल पर उसके लाभ का आधा व्याज होना चाहिए । इस प्रकार के लेन-देन का हिसाब-किताब वर्ष में एक बार अवश्य करना चाहिए ।

(५) यदि विदेश में चले जाने के कारण या जान-बूझकर खरीददार अपने माल को नहीं निकालता तो वह माल के मूलधन का दुगुना मूल्य बेचने वाले को अदा करे । अवधि से पहिले ही जो व्याज मांगे, अथवा व्याज को मूलधन के साथ जोड़कर उतना रुपया मांगे, उसे मांगे हुए धन का, चौगुना दण्ड देना चाहिए । थोड़ा धन

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