भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ६७ : अ० ११ ] ऋ॒ण सम्बन्धी नियम ३०१

(१) नानर्णसमवाये तु नैकं द्वौ युगपदभिवदेयाताम् अन्यत्र प्रतिष्ठ- मानात् । तत्रापि गृहीतानुपूर्व्या राजश्रोत्रियद्रव्यं वा पूर्वं प्रतिपादयेत् । (२) दम्पत्योः पितापुत्रयोर्भ्रातॄणां चाविभक्तानां परस्परकृतमृणम- साध्यम् । (३) अग्राह्याः कर्मकालेषु कर्षका राजपुरुषाश्च। स्त्री वाऽप्रतिश्राविणी पतिकृतमृणमन्यत्र गोपालकार्धसीतिकेभ्यः । (४) पतिस्तु ग्राह्यः स्त्रोकृतमृणमप्रतिविधाय प्रोषित इति । सम्प्रति- पत्तावुत्तमः । असम्प्रतिपत्तौ तु साक्षिणः प्रमाणम् । प्रात्ययिकाः शुचयोऽनु- मतो वा त्रयोऽवरास्त्र्यर्थाः । पक्षानुमतौ वा द्वौ ऋणं प्रति, न त्वेवैकः ।


तथा जामिन के द्वारा चुकता किये जाने योग्य ऋण को केवल उनके पुत्र, पौत्र ही अदा करें।

(१) एक व्यक्ति पर अनेक व्यक्तियों का कर्जा : यदि एक व्यक्ति पर अनेक व्यक्तियों का कर्जा हो तो उस पर एक साथ अनेक कर्जा देने वाले मुकदमा नहीं चला सकते हैं, किन्तु यदि वह कर्जदार कहीं विदेश को जा रहा हो तो उस पर एक साथ अनेक मुकदमे चलाये जा सकते हैं। मुकदमों का फैसला हो जाने के बाद ऋण का भुगतान उसी क्रम से होना चाहिए, जिस क्रम से उसको लिया गया है। यदि उसमें राजा या ब्राह्मण का कर्जा निकले तो उसका भुगतान सबसे पहिले होना चाहिए।

(२) भार्या, पति, पिता, पुत्र और एक साथ रहने वाले भाई परस्पर कर्जा लें-दें तो उनके कर्जे का मुकदमा अदालत में नहीं चलाया जा सकता ।

(३) कर्जा लेने वाले किसान और राज-कर्मचारी यदि काम पर लगे हों तो ऋण के सम्बन्ध में उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। पति के कर्ज लिए हुए ऋण को यदि उसकी स्त्री चुकाना मंजूर नहीं करती तो उस पर किसी प्रकार का जोर-दबाव नहीं डाला जा सकता है; किन्तु ग्वाला आदि कार्यों की कमाई पर निर्भर रहने वाले लोगों की स्त्रियाँ अपने पति की अनुपस्थिति में अपने पति का कर्जा चुकता करने की जिम्मेदार हैं।

(४) साक्षियों की गवाह : यदि पत्नी कर्जा ले तो उसको अदा करने के लिए उसके पति को विवश किया जा सकता है। स्त्री के ऋण को न चुकाने की नौबत से बच कर या बहाना करके यदि कोई पुरुष विदेश चला जाय और उसकी यह बात सावित हो जाय तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। यदि कारण सिद्ध न हो सके तो साक्षियों की गवाही के अनुसार निर्णय किया जाय। दोनों पक्षों से अनुमत कम-से-कम तीन गवाह होने चाहिए। जो विश्वास योग्य और चरित्रवान् हों। अथवा दोनों पक्षों की राय से दो गवाह भी हो सकते हैं। किन्तु कर्जे के मामले में एक गवाह कदापि न होना चाहिए।