भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ६७ : अ० ११ ] ऋण सम्बन्धी नियम ३०३

राजानं गच्छेत् । राज्ञश्च किल्विषं युष्मानन्यथावादे । दण्डश्चानुबन्धः । पश्चादपि ज्ञायेत यथादृष्टश्रुतम् । एकमन्त्राः सत्यमवहरतेति । (१) अनवहरतां सप्तरात्रादूर्ध्वं द्वादशपणो दण्डः त्रिपक्षादूर्ध्वमभियागं दद्युः । (२) साक्षिभेदे यतो बहवः शुचयोऽनुमता वा ततो नियच्छेयुः । मध्यं वा गृह्णीयुः । तद्वा द्रव्यं राजा हरेत् । साक्षिणश्चेदभियोगादूनं ब्रूयुरतिरिक्तस्याभियोक्ता बन्धं दद्यात् । अतिरिक्तं वा ब्रूयुस्तदतिरिक्तं राजा हरेत् । बालिश्यादभियोक्तुर्वा दुःश्रुतं दुर्लिखितं प्रेताभिनिवेशं वा समीक्ष्य साक्षिप्रत्ययमेव स्यात् । (३) साक्षिबालिश्येष्वेव पृथगनुयोगे देशकालकार्याणां पूर्वमध्यमोत्तमा दण्डा इत्यौशनसाः ।


शत्रु-सेना को जीतकर भी हाथ में खप्पर लेकर भीख मांगते फिरो, यदि झूठ बोलो तो' इस प्रकार शपथ दिलाई जाय । यदि गवाह शूद्र हो तो उसके सम्मुख कहा जाय 'देखो यदि सच न बोलो तो जन्म-जन्मान्तर का तुम्हारा सारा पुण्य राजा को प्राप्त हो; यदि तुमने झूठ बोला तो तुम्हें निश्चित ही दण्ड मिलेगा; बाद में भी सुनकर-देखकर मामले की जाँच-पड़ताल की जायेगी; इसलिए तुम सब लोगों को मिलकर सही-सही कहना चाहिए' इस प्रकार कहा जाय ।

( १ ) इतना कहने पर भी सात दिन तक यदि वे सही-सही वारदात न बतायें तो उनमें प्रत्येक को बारह-बारह पण दण्ड दिया जाय । यदि वे डेढ़ मास तक भी कुछ भेद न खोलें तो उनके विरुद्ध मुकदमे का फैसला किया जाय ।

( २ ) यदि किसी मुकदमे में गवाहों का आपसी मतभेद हो जाय तो उनमें जिस बात को बहुसंख्यक, चरित्रवान्, विश्वासी तथा अनुमत गवाह कहें, उसी के आधार पर फैसला कर दिया जाय अथवा किसी को मध्यस्थ बनाकर फैसला किया जाय । यदि किसी भी युक्ति से फैसला न हो सके तो उस विवादग्रस्त संपत्ति को राजा ले ले । कर्ज की जो रकम कर्जा देने वाले ने बताई है, गवाह यदि उससे कम रकम बताये तो अभियोक्ता उस अधिक बताई रकम का पांचवां हिस्सा राजा को दे दे । यदि गवाह अधिक बताये तो उस अधिक रकम को राजा ले ले । अभियोक्ता यदि मूर्ख हो, ठीक तरह न सुन पाये, ठीक न लिख सके, अथवा पागल हो, तो गवाहों के आधार पर ही ऐसे मामलों का फैसला दिया जाय ।

( ३ ) आचार्य उशना ( शुक्राचार्य ) के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'देश, काल और कार्यों के ठीक-ठीक बताये जाने के कारण अदालत में यदि गवाहों की मूर्खता सिद्ध हो जाय तो उनको उनके अपराध के अनुसार यथोचित प्रथम साहस, मध्यम साहस और उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।'