भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ६८औपनिधिकम्
अध्याय १२

(१) उपनिधिः ऋणेन व्याख्यातः ।
(२) परचक्राटविकाभ्यां दुर्गराष्ट्रविलोपे वा, प्रतिरोधकैर्वा ग्रामसार्थव्रजविलोपे, चक्रयुक्ते नाशे वा, ग्राममध्याग्न्युदकाबाधे वा, किञ्चिदमोक्ष्यमाणे कुप्यमनिर्हार्यवर्जमेकदेशमुक्तद्रव्ये वा, ज्वालावेगोपरुद्धे वा, नावि निमग्नायां मुषितायां वा स्वयमुपरूढो नोपनिधिमभ्याभवेत् ।
(३) उपनिधिभोक्ता देशकालानुरूपं भोगवेतनं दद्यात् । द्वादशपणं च दण्डम् । उपभोगनिमित्तं नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेत्, चतुर्विंशतिपणश्च दण्डः । अन्यथा वा निष्पतने । प्रेतं व्यसनगतं वा नोपनिधिमभ्यावहेत् ।


धरोहर सम्बन्धी नियम

( १ ) ऋण सम्बन्धी नियमों के अनुसार ही उपनिधि सम्बन्धी नियमों को भी समझना चाहिए ।

( २ ) धरोहर : शत्रु के षड्यंत्र और जंगलवासियों के आक्रमण से दुर्ग तथा राष्ट्र का नाश हो जाने पर; या डाकू-चोरों के द्वारा गाँव, व्यापारिक कम्पनियाँ तथा पशुओं का नाश हो जाने पर; या भीतरी षड्यन्त्रों के कारण नाश हो जाने पर; गाँव में आग लग जाने या बाढ़ के कारण नष्ट हो जाने पर, अग्नि या बाढ़ से नष्ट होने वाले ताँबा, लोहा आदि कुप्य वस्तुओं के शेष रह जाने पर; अग्नि से घिर जाने पर, नाव के डूब जाने पर, या नाव के माल की चोरी हो जाने पर, अपना बचाव हो जाने पर भी उपनिधि ( धरोहर ) पाने के लिए कोई व्यक्ति किसी पर मुकदमा नहीं चला सकता है ।

( ३ ) जो व्यक्ति उपनिधि को अपने उपयोग में लाये, देश-काल के अनुसार वह उपयोग का बदलां ( भोगवेतन ) चुका दे और दण्डरूप में बारह पण अदा करे । उपभोग के कारण उपनिधि को नष्ट कर देने वाले व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जाय, और चौबीस पण दण्ड किया जाय । किसी भी प्रकार से उपनिधि के नष्ट हो जाने पर यही नियम लागू किया जाय । यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को लेकर भाग जाय या विपत्ति में फँस जाय तो उस पर न तो अभियोग चलाया जा सकता है और न ही दण्ड किया जा सकता है ।

२० कौ०