कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) आधानविक्रयापव्ययनेषु चास्य चतुर्गुणपञ्चबन्धो दण्डः। परिवर्तने निष्पातने वा मूल्यसमः। (२) तेन आधिप्रणाशोपभोगविक्रयाधानापहारा व्याख्याताः। (३) नाधिः सोपकारः सीदेत्। न चास्य मूल्यं वर्धेत। निरुपकारः सीदेन्मूल्यं चास्य वर्धेतान्यत्र निसर्गात्। (४) उपस्थितस्याधिमप्रयच्छतो द्वादशपणो दण्डः। प्रयोजकासन्निधाने वा ग्रामवृद्धेषु स्थापयित्वा निष्क्रयमाधिं प्रतिपद्येत। निवृत्तवृद्धिको वाधिस्तत्कालकृतमूल्यस्तत्रैवावतिष्ठेत, अनाशविनाशकरणाधिष्ठितो वा। धारणकसंन्निधाने वा विनाशभयादुद्गतार्थं धर्मस्थानुज्ञातो विक्रीणीत। आधिपालप्रत्ययो वा।
(१) यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को कहीं गिरवी रख दे, बेच दे या अन्य किसी तरह से उसका अपव्यय कर दे, उस पर उपनिधि का चौगुना पञ्चबन्ध दण्ड किया जाय। यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को बदले या किसी भी प्रकार से नष्ट करे उससे उपनिधि की कीमत वसूल कर ली जाय।
(२) गिरवी : उपनिधि के समान ही आधि (गिरवी रखी हुई वस्तु) के नाश हो जाने, उपयोग में लाने, बेचने, गिरवी रखने और बदलने आदि के सम्बन्ध में भी नियम समझना चाहिए।
(३) यदि गिरवी रखी हुई वस्तु सोने चांदी के आभूषण (सोपकार) हों तो वे नष्ट नहीं होते और उन पर ब्याज नहीं लिया जाता है। इनके अतिरिक्त आधि के नष्ट हो जाने का भी व्यय रहता है और उस पर ब्याज भी लगता है।
(४) यदि गिरवी रखने वाला व्यक्ति अपनी वस्तु को लेना चाहे और ब्याज आदि के लोभ से उत्तमर्ण उसको देना न चाहे तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय। यदि अधमर्ण को उत्तमर्ण उसके स्थान पर न मिले, तो वह आधि के बदले में लिए धन को उस गाँव के वृद्ध पुरुषों के पास रखकर अपनी गिरवी रखी हुई वस्तु को वापिस ले सकता है। यदि अधमर्ण अपनी आधि को बेचकर अपना कर्जा चुकाना चाहे तो उसी समय उसकी लागत निश्चित करके उस वस्तु को उत्तमर्ण के पास रहने दिया जाय, उसके बाद उत्तमर्ण उस आधि पर ब्याज नहीं ले सकता है। आधि के रखने में उत्तमर्ण का लाभ हो रहा या हानि हो रही है, किन्तु निकट भविष्य में यदि उसके नष्ट हो जाने की आशंका हो, अथवा उसकी लागत से कर्जा की संख्या अधिक हो रही हो, ऐसी अवस्था में, अधमर्ण की अनुपस्थिति में भी, न्यायाधीश (धर्मस्थ) की आज्ञा लेकर उत्तमर्ण उस आधि को बेच दे। न्यायाधीश की अनुपस्थिति में आधिपाल (न्यायविभाग का अधिकारी) से आज्ञा ली जा सकती है।