कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ६८ : अ० १२] धरोहर-सम्बन्धी नियम ३०९
(१) अशुचयो हि कारवः, नैषां करणपूर्वो निक्षेपधर्मः। करणहीनं निक्षेपमपव्ययमानं गूढभित्तिन्यस्तान् साक्षिणो निक्षेप्ता रहस्यप्रणिपातेन प्रज्ञापयेत्, वनान्ते वा मद्यप्रहवणविश्वासेन।
(२) रहसि वृद्धो व्याधितो वा वैदेहकः कश्चित् कृतलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्यापगच्छेत्। तस्य प्रतिदेशेन पुत्रो भ्राता वाभिगम्य निक्षेपं याचेत। दाने शुद्धिः। अन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात्।
(३) प्रव्रज्याभिमुखो वा श्रद्धेयः कश्चित् कृतलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्य प्रतिष्ठेत। ततः कालान्तरागतो याचेत। दाने शुचिरन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात्।
(४) कृतलक्षणेन वा द्रव्येण प्रत्यानयेदेनम्। बालिशजातीयो वा रात्रौ राजदायिकांक्षणभीतः सारमस्य हस्ते निक्षिप्यापगच्छेत्। स एनं बन्धना-गारगतो याचेत। दाने शुचिः अन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात्।
(५) अभिज्ञानेन चास्य गृहे जनमुभयं याचेत। अन्यतरादाने यथोक्तं पुरस्तात्।
( १ ) शिल्पी लोग प्रायः ईमानदार नहीं होते हैं। उनके यहाँ जो निक्षेप रखा जाता है, उसका वे लोग कोई लिखित प्रमाण ( कारणपूर्व ) नहीं देते हैं। यदि वे लोग ऐसे अलिखित निक्षेप का अपव्यय करें तो निक्षेप्ता को चाहिए कि वह छिपे तौर पर दीवारों की ओर से साक्षियों को उनके ( शिल्पियों के ) गुप्त भेद बता दे। अथवा जंगल में नाव में या एकान्त में विश्वास से साक्षियों को बता दे।
( २ ) कोई बीमार या वैदेहक किसी चिह्नित वस्तु को शिल्पी के हाथ में देकर चला जाय। बाद में निक्षेप्ता के कहने पर उसका लड़का या भाई शिल्पी के पास आकर उस चिह्नित निक्षेप को माँगे। यदि वह दे दे तो उसको ईमानदार समझा जाय और न दे तो उससे निक्षेप वसूल कर उसे चोरी की सज़ा दी जाय।
( ३ ) अथवा कोई विश्वासी व्यक्ति सन्यासी का वेष बनाकर किसी चिह्नित वस्तु को शिल्पी के हाथ में सौंप कर चला जाय। फिर कुछ समय बाद वह उस वस्तु को माँगे। उस वस्तु को वापिस कर देने पर शिल्पी को ईमानदार समझा जाय और न दे तो निक्षेप वसूल कर उसे चोरी की सजा दी जाय।
( ४ ) अथवा चिह्नित वस्तु के द्वारा ही उसको गिरफ्तार किया जाय। अथवा कोई व्यक्ति रात में पुलिस से डरा-सा, मूर्ख की शक्ल बनाकर शिल्पी के हाथ में द्रव्य को सौंप कर चलता बने। वह फिर जेल में जाकर शिल्पी से अपना धन माँगे। दे दे तो ईमानदार, अन्यथा धन वसूल कर उसको चोरी का दण्ड दिया जाय।
( ५ ) शिल्पी के घर में माल की शिनाख्त करने के बाद घर के दो आदमियों