भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

३२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) प्रातिभाव्यं दण्डशुल्कशेषमाक्षिकं सौरिकं कामदानं च नाकामः पुत्रो दायादो वा रिक्थहरो दद्यात् । इति दत्तस्यानपाकर्म । (२) अस्वामिविक्रयस्तु । नष्टापहृतमासाद्य स्वामी धर्मस्थेन ग्राहयेत्, देशकालातिपत्तौ वा स्वयं गृहीत्वोपहरेत् । धर्मस्थश्च स्वामिनमनुयुञ्जीत– कुतस्ते लब्धमिति । स चेदाचारक्रमं दर्शयेत, न विक्रेतारं, तस्य द्रव्यस्यातिसर्गेण मुच्येत । विक्रेता चेद्दृश्येत, मूल्यं स्तेयदण्डं च । स चेदपसारमधिगच्छेदपसरेदापसारक्षयादिति । क्षये मूल्यं स्तेयदण्डं च दद्यात् । (३) नाष्टिकं च स्वकरणं कृत्वा नष्टप्रत्याहृतं लभेत । स्वकरणाभावे पञ्चबन्धो दण्डः । तच्च द्रव्यं राजधर्म्यं स्यात् । (४) नष्टापहृतमनिवेद्योत्कर्षतः स्वामिनः पूर्वः साहसदण्डः ।


(१) व्यर्थ का ऋण, दण्डशेष (जुरमाना), शुल्कशेष (दहेज का धन), जुए में हारा धन, शराबखोरी में लिया हुआ ऋण और वेश्या को दिया जाने वाला धन आदि को; मृत पुरुष का कोई भी वारिस यदि न देना चाहे तो कानूनन उसको बाध्य नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक प्रतिज्ञात वस्तु को न दिए जाने के संबंध में कहा गया।

(२) अस्वामि-विक्रय : किसी वस्तु का स्वामी न होते हुए भी जो व्यक्ति उस वस्तु को बेच दे उसका दण्ड-विधान इस प्रकार है : अपनी खोई हुई या चोरी गई वस्तु को उसका मालिक जिस व्यक्ति के पास देखे उसको धर्मस्थ के द्वारा गिरफ्तार करा दे। यदि देश या काल उसमें बाधक हो तो स्वयं ही पकड़ कर उस व्यक्ति को धर्मस्थ के हवाले कर दे। धर्मस्थ उससे पूछे कि 'तुम्हें यह कहाँ मिली?' यदि वह प्राप्त वस्तु के संबन्ध में पूरा विवरण बताकर कहे कि उसको वह वस्तु कहीं पड़ी हुई मिली है और उस वस्तु को उसके असली मालिक को लौटा दे, तो उसे बरी कर दिया जाय। यदि वह उस वस्तु के बेचने वाले व्यक्ति का नाम बताये, तो उस विक्रेता से उस वस्तु का मूल्य खरीदने वाले को दिलाया जाय और वह वस्तु उसके असली मालिक को सौंप दी जाय और बेचने वाले को चोरी का दण्ड दिया जाय। यदि वह भी किसी दूसरे विक्रेता का नाम ले; वह भी किसी दूसरे को बताये, इस प्रकार जो भी उसका पहला विक्रेता सिद्ध हो वही उस वस्तु का मूल्य और चोरी का जुरमाना अदा करे।

(३) खोई हुई वस्तु को उसका मालिक प्रमाणरूप में लेख तथा साक्षी दिखा-कर ही प्राप्त कर सकता है। यदि वह पुरुष उस वस्तु को अपनी सिद्ध न कर सके तो उसके मूल्य का पाँचवाँ हिस्सा जुरमाना भरे और वह वस्तु धर्मानुसार राजा के अधिकार में दे दी जाय।

(४) अपनी खोई हुई वस्तु को किसी के पास देखकर बिना धर्मस्थ को सूचित