कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ७२-७३ : अ० १६ ] दान और विक्रय सम्बन्धी नियम ३२५
(१) शुल्कस्थाने नष्टापहृतोत्पन्नं तिष्ठेत् । त्रिपक्षादूर्ध्वमनभिसारं राजा हरेत्, स्वामी वा स्वकरणेन । (२) पञ्चपणिकं द्विपदरूपस्य निष्क्रयं दद्यात्; चतुष्पणिकमेकखुरस्य; द्विपणिकं गोमहिषस्य; पादिकं क्षुद्रपशूनाम् । रत्नसारफलगुकुप्यानां पञ्चकं शतं दद्यात् । (३) परचक्राटवीहृतं तु प्रत्यानीय राजा यथास्वं प्रयच्छेत् । चोरहृतमविद्यमानं स्वद्रव्येभ्यः प्रयच्छेत्, प्रत्यानेतुमशक्तो वा । स्वयंग्राहेणाहृतं प्रत्यानीय तन्निष्क्रयं वा प्रयच्छेत् । (४) परविषयाद्वा विक्रमेणानीतं यथाप्रविष्टं राज्ञा भुञ्जीतान्यत्रार्य-प्राणद्रव्येभ्यो देवब्राह्मणतपस्विद्रव्येभ्यश्च । इत्यस्वामिविक्रयः ।
किये ही, यदि उसका मालिक स्वयं ही छीनने लगे तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( १ ) किसी का खोया हुआ या चोरी गया माल मिल जाय तो वह चुंगीघर में जमा कर दिया जाय । डेढ महीने तक यदि उसका मालिक उसको न ले तो उसको सरकारी माल में जमाकर दिया जाय; अथवा साक्षी आदि के द्वारा मालिक अपना स्वत्व सिद्ध करके उस माल को ले ले ।
( २ ) नष्ट या अपहृत दास-दासी को छुड़ाने के लिए प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच पण, छुड़ाने वाला, जमा करे । इसी प्रकार घोड़े, गधे आदि को छुड़ाने के लिए चार पण; गाय, भैंस आदि को छुड़ाने के लिए दो पण, छोटे-छोटे पशुओं को छुड़ाने के लिए ¼ पण; रत्न आदि बहुमूल्य, टिकाऊ वस्तुओं, रसहीन ( फल्गु ) वस्तुओं और तांबा आदि धातुओं को छुड़ाने के लिए पांच पण सरकारी टैक्स ( निष्क्रय ) छुड़ाने वाला जमा करे ।
( ३ ) दूसरे राजा के द्वारा या जंगलियों द्वारा अपहरण किये हुए दास, दासी या चौपाया आदि को राजा स्वयं लाकर उनके स्वामियों को दे । चोरों द्वारा चुराई गई वस्तु यदि नष्ट हो जाय या राजा भी उसको लौटा कर न ला सके तो, राजा को चाहिए कि अपने द्रव्यों में से उस वस्तु को उसके स्वामी की दे । चोरों को पकड़ने के लिए नियुक्त हुए राजपुरुषों द्वारा लायी गयी वस्तु उसके मालिक को दे दी जाय; यदि ऐसा संभव न हो तो उस खोई हुई वस्तु का मूल्य उसके स्वामी को दे दिया जाय ।
( ४ ) दूसरे देश से जीत कर लाए हुए धन का उपभोग, राजा की आज्ञा प्राप्त कर किया जाय; किन्तु वह धन यदि आर्यों, देवताओं, ब्राह्मणों और तपस्वियों का हो तो उसका उपभोग न कर, प्रत्युत उसको लौटा दिया जाय । यहाँ तक अस्वामि-विक्रय के संबन्ध में कहा गया ।