कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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३३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रजानां दोषबाहुल्याद्राज्ञां वा भावदोषतः ।
रूपव्याजावधर्मिष्ठे धर्म्या तु प्रकृतिः स्मृता ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे साहसं नाम सप्तदशोऽध्यायः;
आदितस्त्रिसप्ततितमः ।
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( १ ) प्रजा के दोषों अपराधों की अधिकता होने पर या राजा के मन में बेईमानी की नियत आ जाने से रूप तथा व्याजी नामक सरकारी टैक्स धर्मानुकूल नहीं माने जाते हैं । इसलिए शास्त्रों में विधान किये गए दंड ही धर्मानुकूल माने गये हैं ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में साहस नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
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