कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ७५ |
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| अध्याय १८ |
वाक्पारुष्यम्
(१) वाक्पारुष्यमुपवादः कुत्सनमभिभर्त्सनमिति । (२) शरीरप्रकृतिश्रुतवृत्तिजनपदानां शरीरोपवादेन काणखञ्जादिभिः सत्ये त्रिपणो दण्डः । मिथ्योपवादे षट्पणो दण्डः । (३) शोभनाक्षिदन्त इति काणखंजादीनां स्तुतिनिन्दायां द्वादशपणो दण्डः । (४) कुष्ठोन्मादक्लैब्यादिभिः कुत्सायां च सत्यमिथ्यास्तुतिनिन्दासु द्वादशपणोत्तरा दण्डास्तुल्येषु । विशिष्टेषु द्विगुणः । हीनेष्वर्धदण्डः । परस्त्रीषु द्विगुणः । प्रमादमदमोहादिभिरर्धदण्डाः ।
वाक्पारुष्य
(१) गाली-गलौज, निन्दा और धमकाना आदि वाक्पारुष्य नामक अपराध के अन्तर्गत हैं। वाक्पारुष्य के पाँच भेद हैं : १. शरीर, २. प्रकृति, ३. श्रुत, ४. वृत्ति और ५. देश ।
(२) शरीर : इनमें शरीर को लक्ष्य करके यदि कोई व्यक्ति काणे, गंजे, लंगड़े, लूले को काणा, गंजा, लंगड़ा, लूला कहकर पुकारे तो उस पर तीन पण दंड किया जाय । यदि झूठी निन्दा करे तो छह पण दंड किया जाय ।
(३) यदि कोई व्यक्ति किसी काणे, लंगड़े आदि की व्याजस्तुति के भाव से यह कहे कि 'वाह तुम्हारी आँखें आदि कितनी सुन्दर हैं' तो उस पर बारह पण दंड किया जाय ।
(४) किसी व्यक्ति की कोढ़ी, पागल या नपुंसक आदि कहकर निन्दा करने वाले पर भी बारह पण दंड किया जाय । यदि कोई व्यक्ति अपने बराबर वालों की सच्ची, झूठी तथा व्याजस्तुति से निन्दा करे तो उस पर क्रमशः बारह, चौबीस और छत्तीस पण दंड किया जाय । यदि अपने से बड़ों के साथ कोई ऐसा व्यवहार करे तो उस पर दुगुना दंड किया जाय । अपने से छोटों के साथ ऐसा करने पर आधा दंड किया जाय । दूसरों की स्त्रियों के साथ ऐसा करने वाले पर भी दुगुना दंड किया जाय । यदि ऐसी निन्दा पागलपन, मद या किसी मोह के कारण की गई हो तो उस पर भी आधा दंड किया जाय ।