कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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३३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) सीमवृक्षेषु चैत्येषु द्रुमेष्वालक्षितेषु च । त एव द्विगुणा दण्डाः कार्या राजवनेषु च ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दण्डपारुष्यं नाम एकोनविंशोऽध्यायः; आदितः पञ्चसप्ततितमः ।
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दंड का आधा दंड दिया जाय । तीर्थस्थानों, तपोवनों और श्मशानों के वृक्षों को काटने वाले पर भी आधा दंड किया जाय ।
( १ ) सीमा के पेड़ों, मन्दिरों के पेड़ों, राजा की ओर से मुहर लगे पेड़ों और सरकारी जंगलों के पेड़ों को काटने पर दुगुना जुर्माना किया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दण्डपारुष्य नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त ।
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