भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 424
३४०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ तीसरा अधिकरण

(१) जितद्रव्यादध्यक्षः पञ्चकं शतमाददीत, काकण्यक्षारलाशलाकाव- क्रयमुदकभूमिकर्मक्रयं च । द्रव्याणामाधानं विक्रयं च कुर्यात् । अक्षभूमि- हस्तदोषाणां चाप्रतिषेधने द्विगुणो दण्डः । (२) तेन समाह्वयो व्याख्यातः अन्यत्र विद्याशिल्पसमाह्वयादिति । (३) प्रकीर्णकं तु । याचितकापक्रीतकाहितकनिक्षेपकाणां यथादेश- कालमदाने, यामच्छायासमुपवेशसंस्थितीनां वा देशकालातिपातने, गुल्म- तरदेयं ब्राह्मणं साधयतः प्रतिवेशानुवेशयोरुपरि निमन्त्रणे च द्वादशपणो दण्डः । (४) सन्दिष्टमर्थमप्रयच्छतो, भ्रातृभार्यां हस्तेन लङ्घयतो, रूपाजीवा- मन्योपरुद्धां गच्छतः, परवक्तव्यं पण्यं क्रीणानस्य, समुद्रं गृहमूद्भिन्दतः, सामन्तचत्वारिंशत्कुल्याबाधामाचारतश्चाष्टचत्वारिंशत्पणो दण्डः । (५) कुलनीवीग्राहकस्यापव्ययने, विधवां च्छन्दवासिनीं प्रसह्याधि-


( १ ) जीतने वाले जुआरी से द्यूताध्यक्ष पाँच प्रतिशत सरकारी कर ले और कौड़ी, पाँसे, अरल ( पाँसे फेंके जाने के लिए चमड़े की चौकी ), शलाका, जल तथा जमीन का किराया भी वसूल करे जुआरियों को चीजें बेचने और गिरवी रखने को इजाजत भी दे दे । यदि अध्यक्ष, जुआरियों को पाँसे, जमीन, हाथ की सफाई आदि से न रोके तो जितना धन वह जुआरियों से वसूल करे, उससे दुगुना जुरमाना उस पर किया जाय ।

( २ ) यही नियम उन लोगों के सम्बन्ध में भी समझने चाहिएँ, जो मुर्गा, तीतर, भेड़ आदि की लड़ाई में बाजी लगाते हैं; किन्तु विद्या और शिल्प की बाजी लगाने वाले जुआरियों के लिए ये नियम नहीं हैं ।

( ३ ) प्रकीर्णक : इस प्रसंग में जिन विषयों के सम्बन्ध में कहना शेष रह गया है उन विषयों को प्रकीर्णक कहते हैं । यदि कोई पुरुष उधार ली हुई ( याचितक ), किराये पर ली हुई ( अवक्रीतक ) और धरोहर के तौर पर रखी हुई ( आहितक ) वस्तु एवं जेवर बनाने के लिए सुवर्ण आदि को ठीक स्थान तथा ठीक समय पर वापिस न करे; निश्चित समय एवं स्थान का वायदा कर फिर न मिले; बेड़ा आदि के द्वारा पार कराके ब्राह्मण से किराया माँगे; पड़ोसी श्रोत्रिय को छोड़कर बाहरी श्रोत्रिय को निमंत्रण दे; तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय ।

( ४ ) वायदा किए धन को न देने वाले; भौजाई का हाथ पकड़कर झटका देने वाले; दूसरे की रखेल वेश्या के यहाँ जाने वाले; दूसरे के हाथ बिके पदार्थ को खरीदने वाले; सरकारी चिह्नों से युक्त मकान को गिराने वाले और सामन्तों के चालीस कुलों तक बाधा पहुँचाने वाले; व्यक्ति पर अड़तालीस पण दण्ड किया जाय ।

( ५ ) जो व्यक्ति वंशानुक्रम से भोगी जाने वाली सर्वसाधारण सम्पत्ति का