कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ७४-७५ : अ० २० ] द्यूतसमाह्वय और प्रकीर्णक ३४१
चरतः, चण्डालस्यार्यां स्पृशतः, प्रत्यासन्नमापद्यनमभिधावतो, निष्कारणमभिधावनं कुर्वतः, शाक्यजीवकादीन् वृषलप्रव्रजितान् देवपितृकार्येषु भोजयतः शत्यो दण्डः । (१) शपथवाक्यानुयोगमनिसृष्टं कुर्वतो, युक्तकर्म चायुक्तस्य, क्षुद्रपशुवृषाणां पुंस्त्वोपघातिनो, दास्या गर्भमौषधेन पातयतश्च पूर्वः साहसदण्डः । (२) पितापुत्रयोर्दम्पत्योर्भ्रातृभगिन्योर्मातुलभागिनेययोः शिष्याचार्ययोर्वा परस्परमपतितं त्यजतः सार्थाभिप्रयातं ग्राममध्ये वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः । कान्तारे मध्यमः । तन्निमित्तं भ्रेषयत उत्तमः । सहप्रस्थायिष्वन्येष्वर्धदण्डः । (३) पुरुषमबन्धनीयं बध्नतो बन्धयतो बन्धं वा मोक्षयतो बालमप्राप्तव्यवहारं बध्नतो बन्धयतो वा सहस्रदण्डः । पुरुषापराधविशेषेण दण्डविशेषः कार्यः । (४) तीर्थकरस्तपस्वी व्याधितः क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तस्तिरोजनपदो दण्डखेदी निष्किञ्चनश्चानुग्राह्याः ।
अपव्यय करे; स्वतन्त्र रहनेवाली विधवा के साथ बलात्कार करे; चाण्डाल होकर आर्या स्त्री को छूए; पड़ोसी की आपत्ति पर सहायता न करे; बिना कारण पड़ोसी के यहाँ जाये आये और बौद्ध भिक्षुओं तथा शूद्रा संन्यासियों को यज्ञादि देवकर्मों तथा श्राद्धादि पितृकर्मों में भोजन कराये; उस पर सौ पण दण्ड दिया जाय ।
( १ ) न्यायाधीश ( धर्मस्थ ) की आज्ञा के बिना ही साक्षी के तौर पर शपथ खाने वाले; अनधिकारी को अधिकार देने वाले; छोटे-छोटे पशुओं को बधिया बना देने वाले और दवा देकर दासी के गर्भ को गिरा देने वाले; व्यक्ति को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( २ ) पिता-पुत्र, भाई-बहिन, मामा-भांजा और गुरु-शिष्य आदि में से कोई भी किसी को बिना पतित हुए त्याग दे; या किसी व्यापारी काफिले का मुखिया अपने साथ के किसी बीमार व्यक्ति को रास्ते के किसी गाँव में ही छोड़ दे; उनको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि किसी बीहड़ वन में छोड़ दे तो मध्यम साहस दण्ड दिया जाय और यदि मार डाले तो उस व्यापारी को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय तथा उसके साथ जितने लोग हों, उन पर इसी अपराध में आधा दण्ड किया जाय ।
( ३ ) जो व्यक्ति किसी बेगुनाह व्यक्ति को बाँधे या बँधवाये, अथवा किसी कैदी को छोड़ दे या किसी नाबालिग बच्चे को बांधे, बँधवाये उस पर हजार पण दण्ड किया जाय । निष्कर्ष यह है कि किसी भी व्यक्ति को अपराध के अनुसार ही दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ४ ) दानी, तपस्वी, बीमार, भूखा, प्यासा, रास्ते का थका, परदेशी, अनेक बार दण्ड पाने से दुःखी और निर्बल-निर्धन व्यक्तियों पर सदा अनुग्रह रखना चाहिए ।