कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३४२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) देवब्राह्मणतपस्विस्त्रीबालवृद्धव्याधितानामनाथानामनभिसरतां धर्मस्थाः कार्याणि कुर्युः । न च देशकालभोगच्छलेनातिहरेयुः । (२) पूज्या विद्याबुद्धिपौरुषाभिजनकर्मतिशयतश्च पुरुषाः । (३) एवं कार्याणि धर्मस्थाः कुर्युरच्छलदर्शिनः । समाः सर्वेषु भावेषु विश्वास्या लोकसम्प्रियाः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे द्यूत-समाह्वय-प्रकीर्णकं नाम विंशोऽध्यायः; आदितः षट्सप्ततितमः । समाप्तमिदं धर्मस्थीयं तृतीयमधिकरणम् ।
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(१) धर्मस्थ अधिकारियों को चाहिए कि वे देव, ब्राह्मण, तपस्वी, स्त्री, बालक, बूढ़ा, बीमार और अपने दुःखों को कहने के लिए न जाने वाले अनाथों का कार्य खुद ही कर दिया करें। स्थान तथा समय का बहाना लगाकर उनके धन का अपहरण न किया जाय; अथवा देश, काल के बहाने उनको तंग न किया जाय ।
(२) जो व्यक्ति विद्या, बुद्धि, पौरुष, कुल और सत्कार्यों के कारण आदरयोग्य हों, उनकी सदा प्रतिष्ठा की जाय ।
(३) इस प्रकार धर्मस्थ अधिकारियों को चाहिए कि छल-कपट से विलग होकर वे अपने कार्यों को सम्पन्न करें और सबको एक समान निगाह में रखकर एवं जनता के विश्वासपात्र बनकर लोकप्रियता प्राप्त करें ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में द्यूतसमाह्वयप्रकीर्णक नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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