भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ७८ : अ० ३ ] दैवी आपत्तियों का प्रतीकार ३५७

(१) पर्वसु च नदीपूजाः कारयेत् । (२) मायायोगविदो वेदविदो वर्षमभिचरेयुः । (३) वर्षाविग्रहे शचीनाथगङ्गापर्वतमहाकच्छपूजाः कारयेत् । (४) व्याधिभयमौपनिषदिकैः प्रतीकारैः प्रतिकुर्युः । औषधैश्चिकित्सकाः शान्तिप्रायश्चित्तैर्वा सिद्धतापसाः । (५) तेन मरको व्याख्यातः । तीर्थाभिषेचनं महाकच्छवर्धनं गवां श्मशानावदोहनं कबन्धदहनं देवरात्रिं च कारयेत् । (६) पशुव्याधिमरके स्थानान्यर्थनीराजनं स्वदैवतपूजनं च कारयेत् । (७) दुर्भिक्षे राजा बीजभक्तोपग्रहं कृत्वाऽनुग्रहं कुर्यात् । दुर्गसेतुकर्म वा भक्तानुग्रहेण । भक्तसंविभागं वा । देशनिक्षेपं वा । मित्राणि वा व्यपाश्रयेत । कर्शनं वमनं वा कुर्यात् ।


( दृति ), तमेड़ ( प्लव ), लकड़ या लकड़ी के बेड़े से बचाया जाय । जो व्यक्ति डूबते हुए आदमी को बचाने का यत्न न करे उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; किन्तु उसके पास यदि तैरने के उक्त साधन न हों तो उसको अपराधी न समझा जाय ।

( १ ) पूर्णमासी आदि पर्व तिथियों में नदियों की पूजा करायी जाय ।

( २ ) मंत्रविद् एवं अथर्व वेद के ज्ञाताओं से अतिवृष्टि की शान्ति के लिए जप, होम, यज्ञ आदि अनुष्ठान कराये जांय ।

( ३ ) वर्षा के शान्त हो जाने पर इन्द्र, गंगा, पर्वत और समुद्र की पूजा करायी जाय ।

( ४ ) बीमारी से रक्षा : औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा कृत्रिम बीमारियों को रोका जाय । अकृत्रिम बीमारियों को वैद्य लोग चिकित्सा द्वारा और सिद्ध एवं तपस्वी लोग शान्तिकर्म, व्रत, उपवास आदि अनुष्ठानों से दूर करें ।

( ५ ) हैजा, प्लेग, चेचक आदि संक्रामक व्याधियों को दूर करने के लिए भी इसी प्रकार के उपाय किये जायें । इसके अलावा गंगास्नान, समुद्रपूजन, श्मशान में गायों का दोहन, चावल तथा सत्तू से बने सिर रहित पुतले का श्मशान में दाह और रात्रि जागरण करके ग्राम देवता की पूजा आदि का उपाय किये जांय ।

( ६ ) यदि पशुओं में बीमारी या महामारी फैल जाय तो गाँव-गांव में रोगशांति के लिए शांतिकर्म करवाये जायें और पशुओं के अधिष्ठाता देवता, जैसे हाथी के सुब्रह्मण्य, घोड़ा के अश्विनी, गौ के पशुपति, भैंस के वरुण तथा बकरी के अग्नि आदि देवताओं की पूजा करायी जाय ।

( ७ ) दुर्भिक्ष से रक्षा : राज्य में दुर्भिक्ष पड़ जाने पर राजा की ओर से बीज और अन्न वितरण करके जनता पर अनुग्रह किया जाय । अथवा दुर्भिक्षपीड़ितों को