कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण
(१) निष्पन्नसस्यमन्यविषयं वा सजनपदो यायात् । समुद्रसरस्तटाकानि वा संश्रयेत । धान्यशाकमूलफलावापान् सेतुषु कुर्वीत । मृगपशुपक्षिव्यालमत्स्यारम्भान् वा । (२) मूषिकभये मार्जारनकुलोत्सर्गः । तेषां ग्रहणहिंसाया द्वादशपणो दण्डः । शुनामनिग्रहे च अन्यत्रारण्यचरेभ्यः । (३) स्नुहीक्षीरलिप्तानि धान्यानि विसृजेत् । उपनिषद्योगयुक्तानि वा । मूषिककरं वा प्रयुञ्जीत । शान्तिं वा सिद्धतापसाः कुर्युः । पर्वसु च मूषिकपूजाः कारयेत् । (४) तेन शलभपक्षिकृमिभयप्रतीकारा व्याख्याताः । (५) व्यालभये मदनरसयुक्तानि पशुशवानि प्रसृजेत् । मदनकोद्रवपूर्णान्यौदर्याणि वा ।
उचित वेतन देकर उनसे दुर्ग या सेतु आदि का निर्माण कराया जाय । काम करने में असमर्थ लोगों को केवल अन्न दिया जाय; अथवा उनको समीप के दूसरे दुर्भिक्ष रहित देश तक पहुँचाने का प्रबन्ध कर दिया जाय । अथवा मित्र राजा से सहायता ली जाय । अपने देश के धनवान् व्यक्तियों पर विशेष कर लगाकर तथा उनसे एकमुश्त रकम लेकर आपत्ति का प्रतीकार किया जाय ।
(१) या तो जो देश धन-धान्य संपन्न दीखे वहीं प्रजा सहित चला जाय । अथवा समुद्र के किनारे या बड़े-बड़े तालाबों के पास जाकर बसा जाय, जहाँ पर कि धान्य, शाक, मूल, फल आदि की खेती की जा सके । अथवा मृग, पशु, पक्षी, व्याघ्र और मछली आदि का शिकार कर प्राण-रक्षा की जाय ।
(२) चूहों से रक्षा : चूहों का उत्पात बढ़ जाने पर जगह-जगह बिल्ली और नेवला छोड़ दिए जायें । जो उनको पकड़े या मारे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । उन लोगों पर भी बारह पण दण्ड किया जाय, जो दूसरों का नुकसान करने वाले पालतू कुत्तों को रोक कर न रखें । जंगली कुत्तों को न पकड़ने पर कोई अपराध न माना जाय ।
(३) चूहों के प्रतीकार के लिए सेंहुड़ के दूध में साने हुए अनाज को या औपनिषदिक अधिकरण में निर्दिष्ट औषधियों से मिले हुए अनाज को इधर-उधर बखेर दिया जाय । अथवा चूहादानी द्वारा चूहों को पकड़ने का प्रबन्ध किया जाय । अथवा सिद्ध या तपस्वियों द्वारा चूहों को नष्ट करने के लिए शान्तिकर्म करवाये जांय । पर्व तिथियों पर मूषक-पूजा कराई जाय ।
(४) इसी के अनुसार कीट, पतङ्ग, पक्षी आदि द्वारा उत्पन्न उत्पातों का प्रतीकार कराया जाय ।
(५) व्याघ्र से रक्षा : व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं का भय बढ़ जाय तो औप-