कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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३६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) सर्वत्र चोपहतान् पितेवानुगृह्णीयात् । (२) मायायोगविदस्तस्माद्विषये सिद्धतापसाः । वसेयुः पूजिता राज्ञा दैवापत्प्रतिकारिणः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे उपनिपातप्रतीकारो नाम तृतीयोऽध्यायः; आदित एकोनाशीतितमः ।
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( १ ) इस प्रकार के भयों के उपस्थित होने पर सव तरह से राजा, प्रजा की रक्षा अपनी सन्तान की तरह करे ।
( २ ) इसलिए राजा को चाहिए कि वह दैवी विपदाओं का प्रतीकार करने वाले अथर्व वेद के ज्ञाता तान्त्रिकों, सिद्धों और तपस्वियों को अपने देश में सम्मानपूर्वक रखें ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में उपनिपातप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त
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