कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 445, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ७९ |
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| अध्याय ४ |
गूढाजीविनां रक्षा
(१) समाहर्तृप्रणिधौ जनपदरक्षणमुक्तम् । तस्य कण्टकशोधनं वक्ष्यामः। (२) समाहर्ता जनपदे सिद्धतापसप्रव्रजितचक्रचरचारणकुहकप्रच्छन्द- ककार्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकचिकित्सकोन्मत्तमूकबधिरजडान्धवैदेहक- कारुशिल्पिकुशीलववेशशौण्डिकापूपिकपाक्वमांसिकौदनिकव्यञ्जनान् प्रणि- दध्यात् । ते ग्रामाणामध्यक्षाणां च शौचाशौचं विद्युः । यं चात्र गूढाजीविनं शङ्केत, सत्रिणसवर्णेनापसर्पयेत् । धर्मस्थं प्रदेष्टारं वा विश्वासोपागतं सत्री ब्रूयात्—'असौ मे बन्धुरभियुक्तः, तस्यायमनर्थः प्रतिक्रियताम् । अयं चार्थः प्रतिगृह्यताम्' इति । स चेत् तथा कुर्यात्, उपग्राहक इति प्रवास्येत । (३) तेन प्रदेष्टारो व्याख्याताः । (४) ग्रामकूटमध्यक्षं वा सत्री ब्रूयात्—'असौ जाल्मः प्रभूतद्रव्यः,
गुप्त षडयंत्रकारियों से प्रजा की रक्षा के उपाय
(१) जनपद की रक्षा के उपाय समाहर्तृ प्रचार नामक प्रकरण में बताये जा चुके हैं । अब जनपद में गुप्त कण्टकों के प्रतीकार का उपाय बताया जा रहा है ।
(२) समाहर्ता को चाहिए कि वह गुप्त षडयंत्र कार्यों को जानने के लिए सारे देश में सिद्ध, तपस्वी, सन्यासी, परिव्राजक, भाट, जादूगर, स्वेच्छाचारी, यमपट को को दिखाकर जीविका चलाने वाले, शकुन बताने वाले, ज्योतिषी, वैद्य, उन्मत्त, गूं गे, बहरे, मूर्ख, व्यापारी, कारीगर, नट, भांड, कलवार, हलवाई, पक्का माँस बेचने वाले और रसोइया आदि के वेष में गुप्तचरों को नियुक्त करे । उन गुप्तचरों को चाहिए कि वे ग्रामीणों तथा ग्राम-प्रधानों की ईमानदारी और बेईमानी का पता लगाएँ । जिन्हें वे गूढाजीवी समझें उन्हें सत्री नामक गुप्तचर के साथ न्यायाधीश (धर्मस्थ) के पास भेज दें । विश्वस्त धर्मस्थ से सत्री यों कहे 'यह मेरा भाई है इसने ऐसा अपराध किया है । इसके इस अपराध को माफ कर दीजिए और इसके बदले में इतना धन ले लीजिए' । यदि न्यायाधीश उस धन को लेकर अपराधी को छोड़ दे तो उस पर घूस-खोरी का जुर्म लगाकर उसे बर्खास्त किया जाय ।
(३) यही नियम प्रदेष्टा (कण्टकशोधन का कमिश्नर) के संबंध में भी समझने चाहिएँ ।
(४) गाँव के लोगों से या गाँव के मुखिया से सत्री कहे कि 'यह पापी बड़ा सम्पत्तिशाली है; इस समय इस पर ऐसी आपत्ति आई है इसलिए चलो आपत्ति के