कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ७६ : अ० ४ ] गुप्त षड्यन्त्रों का प्रतीकार ३६३
(१) तेन मदनयोगव्यवहारी व्याख्यातः । (२) यं वा नानालोहक्षाराणामङ्गारभस्त्रासन्दंशमुष्टिकाधिकरण-बिम्बटङ्कमूषाणामभीक्ष्णं क्रेतारं मषीभस्मधूमदिग्धहस्तवस्त्रलिङ्गं कर्मारोपकरणसंवर्गं कूटरूपकारकं मन्येत, तं सत्री शिष्यत्वेन संव्यवहारेण चानुप्रविश्य प्रज्ञापयेत् । प्रज्ञातः कूटरूपकारक इति प्रवास्येत । (३) तेन रागस्यापहर्ता कूटसुवर्णव्यवहारी च व्याख्यातः । (४) आरब्धारस्तु हिंसायां गूढाजीवास्त्रयोदश । प्रवास्या निष्क्रयार्थं वा दद्युर्दोषविशेषतः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे गूढाजीविनां रक्षा नाम चतुर्थोऽध्यायः, आदितोऽशीतितमः ।
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( १ ) यही नियम उन व्यापारियों के संबन्ध में भी समझने चाहिएँ जो बेहोश करने वाली दवाइयों को बेचते हैं ।
( २ ) जो व्यक्ति अनेक प्रकार का लोहा, खाद, कोयला, धौंकनी, सनसी, हथौड़ी निहाई ( अधिकरणी ), तस्वीर, छेनी और मूषा आदि पदार्थों को अधिक संख्या में खरीदे; जिसके हाथ या कपड़ों पर स्याही, राख तथा धूएँ के चिह्न हों, जो लोहार तथा सोनार के सभी औजार रखता हो; ऐसे व्यक्ति के ऊपर यदि छिपकर जाली सिक्का बनाने का सन्देह पैदा हो जाय तो सत्री उसका शिष्य बनकर एवं उससे अच्छी तरह मेल-जोल बढ़ाकर उसके रहस्यों की पूरी जानकारी राजा को दे । इस बात का निश्चय हो जाने पर कि वह छिपकर जाली सिक्का बनाता है, उसे प्रवासित कर दिया जाय ।
( ३ ) सोने आदि का रंग उड़ा देने वाले तथा बनावटी सोने के संबन्ध में भी भी यही नियम समझने चाहिएँ ।
( ४ ) धर्मस्थ, प्रदेष्टा, गाँव का मुखिया, गाँव का अध्यक्ष, कूट साक्षी, कूट श्रावक, वशीकरण कर्ता, क्रियाशील अभिचारशील, विष देने वाला, मदनयोग व्यापारी, कूटरूप कर्ता और कूट सुवर्ण व्यापारी; ये तेरह प्रकार के लोक के उपद्रव करने वाले गूढ़जीवी ऊपर बताए गये हैं। इन्हें देशनिकाला दिया जाय या अपराध के अनुसार दण्डित किया जाय ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में गूढ़जीवियोंकी रक्षा नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
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