कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 451, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ८१ | ## शङ्कारूपकर्माभिग्रहः |
|---|---|
| अध्याय ६ |
(१) सिद्धप्रयोगादूर्ध्वं शङ्कारूपकर्माभिग्रहः । (२) क्षीणदायकुटुम्बमल्पनिवेशं विपरीतदेशजातिगोत्रनामकर्मोपदेशं प्रच्छन्नवृत्तिकर्माणं मांससुराभक्ष्यभोजनगन्धमाल्यवस्त्रविभूषणेषु प्रसक्तमतिव्ययकर्तारं पुंश्चलीद्यूतशौण्डिकेषु प्रसक्तमभीक्ष्ण प्रवासिनमविज्ञातस्थानगमनमेकान्ताररायनिष्कुटविकालचारिणं प्रच्छन्ने सामिषे वा देशे बहुमन्त्रसन्निपातं सद्यः क्षतव्रणानां गूढप्रतिकारयितारमन्तर्गृहनित्यमभ्यधिगन्तारं कान्तापरं परपरिग्रहाणां परस्त्रीद्रव्यवेश्मनामभीक्ष्णप्रष्टारं कुत्सितकर्मशस्त्रोपकरणसंसर्गं विरात्रे छन्नकुड्यच्छायासंचारिणं विरूपद्रव्याणा-
शंकित पुरुषों की पहिचान; चोरी के माल की पहिचान; और चोर की पहिचान
( १ ) सिद्धवेश गुप्तचरों के कार्यों के बाद अब शंका, रूप और कर्म के द्वारा चोरों को पकड़ने की युक्तियों का विधान किया जाता है।
( २ ) शंकित पुरुषों की पहिचान : उन व्यक्तियों पर चोर, डाकू, हत्यारा तथा प्रजा-पीड़क होने की शंका की जा सकती है : जिनकी बाप-दादों की सम्पत्ति, खेती-बारी आदि धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही हो; जिनको खाने और खर्च के लिए पर्याप्त वेतन न मिलता हो; जो लोग अपना देश, जाति, गोत्र, नाम और अपने अध्यवसाय का ठीक-ठीक पता न देते हों; जो लोग जीविका के लिए छिपे तौर पर कार्य करते हों; जिन्हें मद्य, मांस, इत्र, फुलेल, बढ़िया वस्त्र और बनाव-श्रृंगार का शौक हो; अति खर्चीले, वेश्याओं, जुआरियों और शराबियों के बीच रहने वाले; बार-बार विदेश जाने वाले किन्तु जिनके गन्तव्य स्थान का कुछ पता न हो; जो एकांत जंगलों या सघन बगीचों में कुसमय जाते हों; जो धनवानों के घरों के आस-पास छिपे तौर पर चक्कर लगाते हों; जो अपने शरीर के घावों की मरहम पट्टी छिपकर कराते हों; जो सदा ही घर में घुसे रहते हों; जो किसी पुरुष को सामने आते देखकर अचानक ही लौट पड़ते हों; जो स्त्रियों में अति आसक्त हों; दूसरे के घर का हालचाल, स्त्री, द्रव्य आदि के सम्बन्ध में बार-बार पूछने वाले; चोरी, कुकर्मों, शस्त्र-अस्त्रों तथा इस प्रकार के दूसरे साधनों को जानने वाले; जो आधीरात में छिप कर दीवारों की छाया