कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
गूढबलैर्घातयेयुः, मदनरसयुक्तेन वा पथ्यादनेन। अनुगृहीतलोप्त्रभाराना- यतगतपरिश्रान्तान् प्रस्वपतः प्रहवणेषु योगसुरामत्तान् वा ग्राहयेयुः। (१) पूर्ववच्च गृहीत्वैनान् समाहर्ता प्ररूपयेत्। सर्वज्ञख्यापनं राज्ञः कारयन् राष्ट्रवासिषु॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे सिद्धव्यञ्जनैर्माणवप्रकाशनम् नाम पञ्चमोऽध्याय, आदित एकाशीतितमः।
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डालने का सुझाव दें जहाँ पर जाली सोना, चाँदी तथा ताँबा आदि का समान तैयार करने वाले व्यापारी रहते हैं। जब ये लोग चोरी के लिए घुसें कि तत्काल ही पहिले से छिपी हुई सेना इनका काम तमाम कर दे। या रात में विषाक्त भोजन देकर इन्हें मार डाला जाय, या चोरी का माल ढोने के कारण थक कर सोये हुए, अथवा भोजन के साथ बढ़िया मदिरा पीने के कारण बेहोश हुए, इनको गिरफ्तार किया जाय।
(१) जब उनको गिरफ्तार किया जाय तब समाहर्ता को चाहिए कि वह पहिले की तरह उन्हें जनता के सामने खड़ा कर राजा की सर्वज्ञता की घोषणा करे।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सिद्धव्यञ्जन से माणवप्रकाशन नामक पाँचवां अध्याय समाप्त।
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