कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 460, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ८३ | वाक्यकर्मानुयोगः अध्याय ८ |
(१) मुषितसन्निधौ बाह्यानामाभ्यन्तराणां च साक्षिणमभिशस्तस्य देशजातिगोत्रनामकर्मसारसहायनिवासाननुयुञ्जीत । तांश्चापदेशैः प्रति-समानयेत् । ततः पूर्वस्याह्नः प्रचारं रात्रौ निवासं च आग्रहणादिति अनुयु-ञ्जीत । तस्यापचारप्रतिसन्धाने शुद्धः स्यात् । अन्यथा कर्मप्राप्तः ।
(२) त्रिरात्रादूर्ध्वमग्राह्यः शङ्कितकः पृच्छाभावादन्यत्रोपकरण-दर्शनात् ।
(३) अचोरं 'चोर' इत्यभिव्याहरतश्चोरसमो दण्डः, चोरं प्रच्छाद-यतश्च ।
(४) चोरेणाभिशस्तो वैरद्वेषाभ्यामपदिष्टकः शुद्धः स्यात् । शुद्धं परिवासयतः पूर्वः साहसदण्डः ।
जाँच और यातना के द्वारा चोरी को अंगीकार कराना
( १ ) जिसकी चोरी हुई हो उसके सामने और बाहर-भीतर के दूसरे लोगों के सामने गवाह से, चोरी के सन्देह में गिरफ्तार हुए व्यक्तियों का देश, जाति, गोत्र, नाम, काम, सम्पति, मित्र और निवासस्थान के सम्बन्ध में पूछा जाय । तदनन्तर जिरह ( उपदेश ) में उसके बयानों की आलोचना की जाय । गवाह के बयानों की आलोचना हो जाने के बाद गिरफ्तार हुए व्यक्तियों से उनका पिछला कार्य, रात का निवास और जिस समय वह पकड़ा गया है उस समय तक के सब कार्यों के सम्बन्ध में पूछ-ताछ की जाय । यदि वह निर्दोष साबित हो जाय तो उसको बरी कर दिया जाय, अन्यथा उसको सजा दी जाय ।
( २ ) चोरी के तीन दिन बाद सन्दिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार न किया जाय, क्योंकि इतने दिन बीत जाने के कारण उससे सही बातें मालूम नहीं हो सकती है । किन्तु किसी के पास यदि चोरी के सबूत मिल जाँय तो उसे तीन दिन के बाद भी गिरफ्तार किया जाय ।
( ३ ) जो व्यक्ति साधु पुरुष को ( चोर ) बताये उसे चोरी का दण्ड दिया जाय और यही दण्ड उसे भी दिया जाय जो चोर को छिपाने का यत्न करे ।
( ४ ) यदि चोर व्यक्ति दुश्मनी के कारण किसी सज्जन पुरुष को पकड़वाये और यह बात सिद्ध हो जाय तो उसे अपराधी न समझा जाय । जो अधिकारी ( प्रदेष्टा ) निरपराध को दण्ड दे उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।