कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ८३ : अ० ८ ] जाँच और यातनाविधि ३७७
(१) शङ्कानिष्पन्नमुपकरणमन्त्रिसहायरूपवैय्यापृत्यकरान् निष्पादयेत् । कर्मणश्च प्रवेशद्रव्यादानांशविभागैः प्रतिसमानयेत् । (२) एतेषां कारणानामनभिसन्धाने विप्रलपन्तमचोरं विद्यात् । दृश्यते ह्यचोरोऽपि चोरमार्गे यदृच्छया सन्निपाते चोरवेषशस्त्रभाण्डसामान्येन गृह्यमाणो दृष्टश्चोरभाण्डस्योपवासेन वा यथा हि माण्डव्यः कर्मक्लेशभयादचोरः 'चोरोऽस्मि' इति ब्रुवाणः । तस्मात्समाप्तकरणं नियमयेत् । (३) मन्दापराधं बालं वृद्धं व्याधितं मत्तमुन्मत्तं क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तमत्याशितमामकाशितं दुर्बलं वा न कर्म कारयेत् । (४) तुल्यशीलपुंश्चलीप्रावादिककथावकाशभोजनदातृभिरसर्पयेत् । एवमतिसन्दध्यात् । यथा वा निक्षेपापहारे व्याख्यातम् । (५) आप्तदोषं कर्म कारयेत् । न त्वेव स्त्रियं गर्भिणीं सूतिकां वा मासावरप्रजाताम् । स्त्रियास्त्वर्धकर्म । वाक्यानुयोगो वा ।
( १ ) संदेह में गिरफ्तार हुए व्यक्ति से चोरी करने के उपाय, उसके सलाहकार सहायक वस्तुएँ, चोरी का माल और उसकी मजदूरी के संबंध में विस्तार से पूछताछ की जाय । उससे यह भी पूछा जाय कि चोरी करते समय मकान के भीतर कौन-कौन गया था, क्या-क्या माल हाथ लगा और किस-किस को कितना-कितना हिस्सा मिला ?
( २ ) जो व्यक्ति चोरी सिद्ध करने वाले उक्त प्रश्नों के सम्बन्ध में तो कुछ न कहे; बल्कि डर के मारे अंट-संट बके तो, उसको चोर न समझा जाय । क्योंकि व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि चोर न होते हुए भी, चोरों के रास्ते से जाता हुआ, चोर के समान शक्ल, हथियार और माल लिए हुए राहगीर को भी चोर समझ कर गिरफ्तार कर लिया जाता है; इसी प्रकार चोरी के माल के पास खड़ा निर्दोष व्यक्ति भी गिरफ्तार होते लोक में देखा गया है । उदाहरण के लिए माण्डव्य चोर न होते हुए भी मार के भय से 'मैं चोर हूँ' यह कहते हुए पकड़ा गया था । इसलिए इस प्रकार के मामलों में खूब सोच-विचार करके ही अपराधी को दण्ड देना चाहिए ।
( ३ ) छोटे अपराधी, बालक, बूढ़ा, बीमार, पागल, उन्मादी, भूखा, प्यासा, थका, अति भोजन किये, अजीर्णरोगी और निर्बल आदि व्यक्तियों को कोड़े आदि मारकर शारीरिक दण्ड न दिया जाय ।
( ४ ) समान स्वभाव वाली वेश्याओं, दूतियों, कथकों, सरायों और होटलों आदि के द्वारा छिपे तौर पर बुरा कर्म करने वाले व्यक्तियों का पता लगाया जाय । पहले कही गई युक्तियों से उन्हें धोखा दिया जाय; अथवा निक्षेप चुराने के संबन्ध में जो उपाय बताये गये हैं उन्हीं को काम में लाया जाय ।
( ५ ) जिसका अपराध साबित हो उसी को दण्ड दिया जाय; किन्तु गर्भिणी और