भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० ८३ : अ० ८ ] जाँच और यातनाविधि ३७७

(१) शङ्कानिष्पन्नमुपकरणमन्त्रिसहायरूपवैय्यापृत्यकरान् निष्पादयेत् । कर्मणश्च प्रवेशद्रव्यादानांशविभागैः प्रतिसमानयेत् । (२) एतेषां कारणानामनभिसन्धाने विप्रलपन्तमचोरं विद्यात् । दृश्यते ह्यचोरोऽपि चोरमार्गे यदृच्छया सन्निपाते चोरवेषशस्त्रभाण्डसामान्येन गृह्यमाणो दृष्टश्चोरभाण्डस्योपवासेन वा यथा हि माण्डव्यः कर्मक्लेशभयादचोरः 'चोरोऽस्मि' इति ब्रुवाणः । तस्मात्समाप्तकरणं नियमयेत् । (३) मन्दापराधं बालं वृद्धं व्याधितं मत्तमुन्मत्तं क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तमत्याशितमामकाशितं दुर्बलं वा न कर्म कारयेत् । (४) तुल्यशीलपुंश्चलीप्रावादिककथावकाशभोजनदातृभिरसर्पयेत् । एवमतिसन्दध्यात् । यथा वा निक्षेपापहारे व्याख्यातम् । (५) आप्तदोषं कर्म कारयेत् । न त्वेव स्त्रियं गर्भिणीं सूतिकां वा मासावरप्रजाताम् । स्त्रियास्त्वर्धकर्म । वाक्यानुयोगो वा ।


( १ ) संदेह में गिरफ्तार हुए व्यक्ति से चोरी करने के उपाय, उसके सलाहकार सहायक वस्तुएँ, चोरी का माल और उसकी मजदूरी के संबंध में विस्तार से पूछताछ की जाय । उससे यह भी पूछा जाय कि चोरी करते समय मकान के भीतर कौन-कौन गया था, क्या-क्या माल हाथ लगा और किस-किस को कितना-कितना हिस्सा मिला ?

( २ ) जो व्यक्ति चोरी सिद्ध करने वाले उक्त प्रश्नों के सम्बन्ध में तो कुछ न कहे; बल्कि डर के मारे अंट-संट बके तो, उसको चोर न समझा जाय । क्योंकि व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि चोर न होते हुए भी, चोरों के रास्ते से जाता हुआ, चोर के समान शक्ल, हथियार और माल लिए हुए राहगीर को भी चोर समझ कर गिरफ्तार कर लिया जाता है; इसी प्रकार चोरी के माल के पास खड़ा निर्दोष व्यक्ति भी गिरफ्तार होते लोक में देखा गया है । उदाहरण के लिए माण्डव्य चोर न होते हुए भी मार के भय से 'मैं चोर हूँ' यह कहते हुए पकड़ा गया था । इसलिए इस प्रकार के मामलों में खूब सोच-विचार करके ही अपराधी को दण्ड देना चाहिए ।

( ३ ) छोटे अपराधी, बालक, बूढ़ा, बीमार, पागल, उन्मादी, भूखा, प्यासा, थका, अति भोजन किये, अजीर्णरोगी और निर्बल आदि व्यक्तियों को कोड़े आदि मारकर शारीरिक दण्ड न दिया जाय ।

( ४ ) समान स्वभाव वाली वेश्याओं, दूतियों, कथकों, सरायों और होटलों आदि के द्वारा छिपे तौर पर बुरा कर्म करने वाले व्यक्तियों का पता लगाया जाय । पहले कही गई युक्तियों से उन्हें धोखा दिया जाय; अथवा निक्षेप चुराने के संबन्ध में जो उपाय बताये गये हैं उन्हीं को काम में लाया जाय ।

( ५ ) जिसका अपराध साबित हो उसी को दण्ड दिया जाय; किन्तु गर्भिणी और

३७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) ब्राह्मणस्य सत्रिपरिग्रहः श्रुतवतस्तपस्विनश्च । तस्यातिक्रम उत्तमो दण्डः । कर्तुः कारयितुश्च कर्मणा व्यापादनेन च । (२) व्यावहारिकं कर्मचतुष्कम्–षड् दण्डाः, सप्त कशाः, द्वावुपरि निबन्धौ, उदकनालिका च । (३) परं पापकर्मणां नववेत्रलताद्वादशकं, द्वावूरुवेष्टौ, विंशतिर्नक्तमाललताः, द्वात्रिंशत्तलाः, द्वौ वृश्चिकबन्धौ, उल्लम्बने च द्वे, सूचीहस्तस्य, यवागूपीतस्याप्रस्रावः, एकपर्वदहनमंगुल्याः, स्नेहपीतस्य प्रतापनमेकमहः, शिशिररात्रौ बलबजाग्रशय्या चेत्यष्टादशकं कर्म । (४) तस्योपकरणं प्रमाणं प्रहरणं प्रधारणमवधारणं च खरपट्टादागमयेत् । (५) दिवसान्तरमेकैकं कर्म कारयेत् ।


और एक महीने से कम प्रसूता स्त्री को हर्गिज दण्ड न दिया जाय । पूर्वोक्त अपराधों में जो दण्ड पुरुषों के लिए कहे गए हैं उनका आधा दण्ड स्त्रियों को दिया जाय; अथवा उनको केवल वाग्दण्ड ( वाणी से ताडना ) ही दिया जाय ।

( १ ) ब्राह्मण, वेदज्ञ और तपस्वी को इतना मात्र दण्ड दिया जाय कि सिपाही उनको इधर-उधर दौड़ा-फिरा दे । जो लोग इन नियमों का उल्लङ्घन करें या कराये तथा अपराधी से काम करायें या उसको मारें, उनको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।

( २ ) लोक व्यवहार में चार प्रकार के दंड प्रसिद्ध है: १. छह डंडे मारना, २. सात कोड़े मारना, ३. हाथ-पैर बाँधकर उलटा लटका देना और ४. नाक में नमक का पानी डालना ।

( ३ ) इनके अतिरिक्त पापाचारी पुरुषों के लिए इतने दण्ड और हैं : नौ हाथ-लम्बी बेंत से बारह बेंत लगाना; दोनों टांगों को बाँधकर करञ्ज की छड़ी से बीस छड़ी मारना; बत्तीस थप्पड़ मारना; बायें हाथ को पीछे बायें पैर से और दायें हाथ को पीछे दायें पैर से बाँधना; दोनों हाथ आपस में बाँधकर लटका देना; हाथ के नाखून में सूई चुभाना; लस्सी पिलाकर पेशाब न करने देना; अंगुली की एक पोर जला देना; घी पिलाकर पूरे दिन अग्नि या धूप में बैठाना; जाड़ों की रात में भीगी हुई खाट पर सुलाना; इस प्रकार कुल मिलाकर ये अठारह प्रकार के ( ४ + १४ ) दण्ड हुए ।

( ४ ) इस प्रकार के दण्डकर्म के लिए रस्सी, डंडे, कोड़े आदि की लम्बाई, दण्डनीय व्यक्ति को खड़ा आदि करने का तरीका और शरीर आदि के अनुकूल दण्ड-व्यवस्था आदि के संबंध में आचार्य खरपट्ट के दण्डशास्त्र-विषयक ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिए ।

( ५ ) कठिन शारीरिक श्रम के कार्यों को एक-एक दिन का अन्तर देकर कराया जाय ।

प्र० ८३ : अ० ८ ] जांच और यातनाविधि ३७९

(१) पूर्वकृतापदानं, प्रतिज्ञायापहरन्तम्, एकदेशदृष्टद्रव्यम्, कर्मणा रूपेण वा गृहीतम्, राजकोशमस्तृणन्तम्, कर्मवध्यं वा राजवचनात्समस्तं व्यस्तमभ्यस्तं वा कर्म कारयेत् ।

(२) सर्वापराधेष्वपीडनीयो ब्राह्मणः । तस्याभिशस्ताङ्को ललाटे स्याद्व्यवहारपतनाय । स्तेये श्वा, मनुष्यवधे कबन्धः, गुरुतल्पे भगम्, सुरापाने मद्यध्वजः ।

(३) ब्राह्मणं पापकर्मणमुद्घुष्याङ्ककृतव्रणम् ।
कुर्यान्निर्विषयं राजा वासयेदाकरेषु वा ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे वाक्यकर्मानुयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः, आदितश्चतुरशीतितमः ।

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( १ ) जो लोग सूचना देकर चोरी करें, प्रण करें, किसी की वस्तु को छीनें, चोरी हुई वस्तु के टुकड़े-टुकड़े करके उसे काम में लाये, चोरी करते या माल ले जाते पकड़े जांय, खजाना उड़ा कर ले जांय और जो हत्या आदि महाअपराध करें, उन सबको राजा के आज्ञानुसार एक साथ, अलग-अलग या बारी-बारी आजीवन कठिन श्रम का दण्ड दिया जाय ।

( २ ) ब्राह्मण को किसी अपराध में मृत्युदण्ड या ताडनदण्ड न दिया जाय, बल्कि जैसे-जैसे वह अपराध करे वैसे-वैसे निशान उसके मस्तक पर दाग दिए जांय, जिससे कि वह पतितों की कोटि में रखा जा सके । चोरी करे तो कुत्ते का निशान, मनुष्यों की हत्या करे तो मनुष्य के धड़ का निशान; गुरु पत्नी के साथ संभोग करे तो योनि का चिह्न; शराब पीये तो प्याले का चिह्न; उस ब्राह्मण के मस्तक पर कर दिया जाय ।

( ३ ) पापी ब्राह्मण के माथे पर ये चिह्न दाग कर समग्र जनता में इस बात की घोषणा की जाय; राजा उसे देश-निर्वासित कर दे; या तो उसे खानों में रहने की आज्ञा दी जाय ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में वाक्यकर्मानुयोग नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ८४# सर्वाधिकरणरक्षणम्
अध्याय ९

(१) समाहर्तृप्रदेष्टारः पूर्वमध्यक्षाणामध्यक्षपुरुषाणां च नियमनं कुर्युः। (२) खनिसारकर्मान्तेभ्यः सारं रत्नं वापहरतः शुद्धवधः । (३) फल्गुद्रव्यकर्मान्तेभ्यः फल्गुद्रव्यमुपस्करं वा पूर्वः साहसदण्डः । (४) पण्यभूमिभ्यो राजपण्यं माषमूल्यादूर्ध्वमापादमूल्यादित्यपहरतो द्वादशपणो दण्डः । आ द्विपादमूल्यादिति चतुर्विंशतिपणः । आ त्रिपादमूल्यादिति षट्त्रिंशत्पणः । आ पणमूल्यादित्यष्टचत्वारिंशत्पणः । आ द्विपणमूल्यादिति पूर्वः साहसदण्डः । आ चतुष्पणमूल्यादिति मध्यमः । आ अष्टपणमूल्यादित्यत्तमः । आ दशपणमूल्यादिति वधः । (५) कोष्ठपण्यकुप्यायुधागारेभ्यः कुप्यभाण्डोपस्करापहारेष्वर्धमूल्येष्वेत एव दण्डाः ।


सरकारी विभागों और छोटे-बड़े कर्मचारियों की निगरानी

( १ ) समाहर्त्ता और प्रदेष्टा अधिकारियों को चाहिए कि पहिले वे विभागीय अध्यक्षों तथा उनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर निगरानी रखें ।

( २ ) जो व्यक्ति खानों या कारखानों से हीरे-जवाहरात आदि बहुमूल्य वस्तुओं की चोरी करें उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति सूत या लकड़ी के कारखानों से सारहीन वस्तुओं की चोरी करें उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति राजकीय खेतों से एक माष से चार माष कीमत की जीरा, अजवायन आदि वस्तुओं को चुराये, उस पर बारह पण दण्ड किया जाय, और जो आठ माष कीमत तक की वस्तुओं को चुराये उस पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार बारह माष तक की वस्तु चुराने पर छत्तीस पण और सोलह माष तक की चुराने पर अठतालीस पण दण्ड किया जाय । यदि दो पण मूल्य तक की वस्तु चुराये तो प्रथम साहस; चार पण मूल्य तक की चुराये तो मध्यम साहस, आठ पण मूल्य तक की चुराये तो उत्तम साहस और दस पण मूल्य तक की चुराये तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय ।

( ५ ) जो व्यक्ति गोदाम से, दूकान से, कारखाने से या शस्त्रागार से आधा माष

प्र० ८४ : अ० ६ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८१

(१) कोशभाण्डागाराक्षशालाभ्यश्चतुर्भागमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः।
(२) चोराणामभिप्रघर्षणे चित्रो घातः । इति राजपरिग्रहेषु व्याख्यातम् ।
(३) बाह्येषु तु प्रच्छन्नमहनि क्षेत्रखलवेश्मापणेभ्यः कुप्यभाण्डमुपस्करं वा माषमूल्यादूर्ध्वमापादमूल्यादित्यपहरतस्त्रिपणो दण्डः। गोमयप्रदेहेन वा प्रलिप्यावघोषणम् । आ द्विपादमूल्यादिति षट्पणः, गोमयभस्मना वा प्रलिप्यावघोषणम् । आ त्रिपादमूल्यादिति नवपणः, गोमयभस्मना वा प्रलिप्यावघोषणं, शरावमेखलया वा। आ पणमूल्यादिति द्वादशपणः, मुण्डनं प्रव्राजनं वा । आ द्विपणमूल्यादिति चतुर्विंशतिपणः, मुण्डस्येष्टका-शकलेन प्रव्राजनं वा । आ चतुष्पणमूल्यादिति षट्त्रिंशत्पणः । आ पञ्चपण-मूल्यादिति अष्टचत्वारिंशत्पणः । आ दशपणमूल्यादिति पूर्वः साहसदण्डः ।


कीमत से लेकर दो माष कीमत तक की धातुओं, उनसे बनी वस्तुओं और छीजन आदि की चोरी करे उस पर भी बारह पण दण्ड किया जाय ।

( १ ) जो व्यक्ति कोष, भांडागार और अक्षशाला से एक काकणी से लेकर एक माष मूल्य तक की वस्तुओं को चुराये उस पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।

( २ ) जो कर्मचारी स्वयं चोरी कर चोरों का बहाना बतायें उन्हें कष्टकर प्राण-दण्ड दिया जाय । इस दण्ड के सम्बन्ध में आगे राजपरिग्रह नामक प्रकरण में विस्तार से कहा जायगा ।

( ३ ) राजकीय कर्मचारियों के अतिरिक्त कोई व्यक्ति यदि खेतों, खलिहानों, घरों और दूकानों से एक माष से चार माष मूल्य तक की वस्तुओं की दिन में चोरी करे तो उस पर तीन पण दण्ड किया जाय या उसकी देह पर गोबर लीपकर उसे सारे शहर में घुमाया जाय । आठ माष कीमत तक की वस्तुओं को चुराने पर छह पण दण्ड दिया जाय, अथवा गोबर की राख से उसका शरीर काला करके उसे शहर भर में घुमाया जाय । बारह माष मूल्य की वस्तुओं की चोरी करने पर नौ पण दण्ड किया जाय या उपले की राख से उसका शरीर काला करके उसे शहर में घुमाया जाय अथवा सकोरों की माला उसकी कमर या गले में डाल कर उसे शहर में घुमाया जाय । सोलह माष मूल्य की वस्तु की चोरी करने पर चोर को बारह पण दण्ड दिया जाय, या उसका शिर मुड़वा कर उसे देश-निकाला दिया जाय । बत्तीस माष की वस्तु चुराने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाय, अथवा शिर मुड़ाकर पत्थर मारते हुए उसको देश से बाहर खदेड़ा जाय । दो पण ( ३२ माष ) कीमत की वस्तु चुराने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय, अथवा पहिले की तरह उसको देश से बाहर खदेड़ा जाय । चार पण कीमती वस्तु को चुराने वाले पर छत्तीस पण दण्ड किया

३८२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौथा अधिकरण

आ विंशतिपणमूल्यादिति द्विशतः । आ त्रिंशत्पणमूल्यादिति पञ्चशतः । आ चत्वारिंशत्पणमूल्यादिति साहस्त्रः । आ पञ्चाशतपणमूल्यादिति वधः । (१) प्रसह्य दिवा रात्रौ वान्तर्याभिकमपहरतोऽर्धमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः । प्रसह्य दिवा रात्रौ वा सशस्रस्यापहरश्चतुर्भागमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः । (२) कुटुम्बिकाध्यक्षमुख्यस्वामिनां कूटशासनमुद्राकर्मसु पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः, यथापराधं वा । (३) धर्मस्थश्चेद्गदमानं पुरुषं तर्जयति, भर्त्सयत्यपसारयति, अभिग्रसते वा, पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । वाक्पारुष्ये द्विगुणम् । (४) पृच्छयं न पृच्छति, अपृच्छयं पृच्छति, पृष्ट्वा वा विसृजति, शिक्षयति, स्मारयति पूर्वं ददाति वेति, मध्यममस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । देयं


जाय । पाँच पण कीमती वस्तु के लिए अठतालीस पण दण्ड, दस पण कीमती वस्तु के लिए प्रथम साहस दण्ड, बीस पण कीमती वस्तु के लिये दो सौ पण दण्ड, तीस पण तक की वस्तु के लिए पाँच सौ पण दण्ड, चालीस पण तक की वस्तु के लिए एक हजार पण दण्ड और पचास पण मूल्य की वस्तु चुराने वाले को प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

(१) किसी रक्षित वस्तु पर दिन या रात में जबरदस्ती डाका डालने पर आधा माष से दो माष तक की वस्तु के लिए छह पण दण्ड दिया जाय । यदि चोर हथियारबन्द हो तो ३/८ माष मूल्य की वस्तु पर ही छह पण दण्ड किया जाय ।

(२) यदि जन-साधारण जाली दस्तावेज या जाली नोट अथवा जाली मुद्राएँ बनायें तो उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय, यदि सुवर्णाध्यक्ष आदि ऐसा कार्य करें तो उन्हें मध्यम साहस दण्ड, यदि गाँव का मुखिया करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड और यदि समाहर्त्ता ही कर बैठे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय, अथवा अपराध के अनुसार यथोचित दण्ड निर्धारित किया जाय ।

(३) यदि न्यायाधीश (धर्मस्थ) अदालत में किसी अभियोक्ता या अभियुक्त को डराये, धमकाये या घुड़के या बाहर निकाल दे, या उससे रिश्वत ले तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि न्यायाधीश गाली दे तो इससे दुगुना दण्ड दिया जाय ।

(४) यदि न्यायाधीश, साक्षी से पूछने योग्य बातों को न पूछकर न पूछी जाने योग्य बातों को पूछे या बिना ही उत्तर पाये बात को छोड़ दे या गवाह को सिखाये या याद दिलाये या उसकी अधूरी बात को स्वयं ही पूरी कर दे, तो उसे मध्यम दण्ड दिया जाय । यदि किसी विचारणीय वस्तु के संबंध में उपयोगी बातों को न पूछ

प्र० ८४ : अ० ६ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८३

देशं न पृच्छति, अदेयं देशं पृच्छति, कार्यमदेशेनातिवाहयति, चलेनातिहरति, कालहरणेन श्रान्तमपवाहयति, मार्गापन्नं वाक्यमुत्क्रमयति, मतिसाहाय्यं साक्षिभ्यो ददाति, तारितानुशिष्टं कार्यं पुनरपि गृह्णाति, उत्तममस्य साहसदण्डं कुर्यात् । पुनरपराधे द्विगुणं, स्थानाद्द्व्यवरोपणं च ।
(१) लेखकश्चेदुक्तं न लिखति अनुक्तं लिखति, दुरुक्तमुपलिखति, सूक्तमुल्लिखति, अर्थोत्पत्तिं वा विकल्पयतीति पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । यथापराधं वा ।
(२) धर्मस्थः प्रदेष्टा वा हैरण्यमदण्ड्यं क्षिपति, क्षेपद्विगुणमस्मै दण्डं दद्यात् । हीनातिरिक्ताष्टगुणं वा । शारीरदण्डं क्षिपति, शारीरमेव दण्डं भजेत । निष्क्रयद्विगुणं वा । यं वा भूतमर्थं नाशयत्यभूतमर्थं करोति, तदष्टगुणं दण्डं दद्यात् ।
(३) धर्मस्थीयाच्चारकान्निःसारयतो बन्धनागाराच्छय्यासनभोजनोच्चारसञ्चारं रोधबन्धनेषु त्रिपणोत्तरा दण्डाः कर्तुः कारयितुश्च ।


कर अनुपयोगी बातें पूछे, यदि बिना गवाह के किसी मामले का निर्णय दे दे, यदि सच्चे साक्षी को कपट की बातों में डालकर झूठा बना दे, यदि व्यर्थ की बातों में साक्षी को उलझाये रखने के बाद छोड़ दे, यदि साक्षी के कथन के क्रम को उलट-पुलट कर लिखे, यदि बीच-बीच में साक्षियों की सहायता करे, यदि निर्णीत मामले को फिर से जिरह में रखे, ऐसे न्यायाधीश को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । दुबारा भी वह यही अपराध करे तो इससे दुगुना दण्ड दिया जाय और उसको पदच्युत किया जाय ।

( १ ) मुहर्रिर ( लेखक ) यदि बयानों को सही-सही न लिखे, न कही हुई बात को लिखे, बुरी बात को अच्छी तथा अच्छी बात को बुरी तरह लिखे या बात के अभिप्राय को ही बदल कर लिखे, उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय या अपराध के अनुसार उसको यथोचित दण्ड दिया जाय ।

( २ ) धर्मस्थ या प्रदेष्टा यदि किसी निरपराधी को सुवर्ण दण्ड दें तो उन पर उससे दुगुना दण्ड किया जाय । यदि वे दण्ड में कमी वेशी करें तो उनसे उसका आठ गुना दण्ड वसूल किया जाय । यदि वे किसी निरपराधी को शारीरिक दण्ड दें तो उनको उससे दुगुना शारीरिक दण्ड दिया जाय । यदि वे शारीरिक दण्ड की जगह अर्थदंड करें तो उनसे उसका दुगुना अर्थदंड वसूल किया जाय । न्यायोचित धन को नष्ट करने और अन्यायपूर्ण धन का संग्रह करने वाले धर्मस्थ या प्रदेष्टा को उस धनराशि का अठगुना दंड दिया जाय ।

( ३ ) न्यायाधीश द्वारा हवालात में बंद कैदी को यदि कोई जेल का कर्मचारी

३८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) चारकादभियुक्तं मुञ्चतो निष्पातयतो वा मध्यमः साहसदण्डः, अभियोगदानं च । बन्धनागारात्सर्वस्वं वधश्च ।
(२) बन्धनागाराध्यक्षस्य संरुद्धकमनाख्याय चारयतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः । कर्मकारयतो द्विगुणः स्थानान्तरत्वं गमयतोऽन्नपानं वा रुन्धतः षण्णवतिदण्डः । परिक्लेशयत उत्कोचयतो वा मध्यमः साहसदण्डः । घ्नतः साहस्रः ।
(३) परिगृहीतां दासीमाहितिकां वा संरुद्धिकामधिचरतः पूर्वः साहसदण्डः । चोरडामरिकभार्यां मध्यमः । संरुद्धिकामार्यामुत्तमः । संरुद्धस्य वा तत्रैव घातः । तदेवाध्यक्षेण गृहीतायार्यायां विद्यात् । दास्यां पूर्वः साहसदण्डः ।
(४) चारकमभित्त्वा निष्पातयतो मध्यमः । भित्त्वा वधः । बन्धनागारात्सर्वस्वं वधश्च ।


घूस लेकर घूमने, फिरने, पानी पीने, सोने, बैठने, खाने, पीने और मल-मूत्र त्यागने की स्वतंत्रता दे या दिलाये तो उस पर उत्तरोत्तर तीन पण अधिक दंड किया जाय ।

( १ ) यदि कोई राजपुरुष किसी अपराधी को हवालात से छोड़ दे या उसको प्रेरित करे, उसे मध्यम साहस दंड दिया जाय और साथ ही अपराधी को जितना देना था उसका भुगतान भी उसी राजपुरुष से किया जाय । यदि कोई प्रदेष्टा ऐसा करे तो उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाय और उसको प्राणदंड दिया जाय ।

( २ ) जेलर की आज्ञा के बिना यदि कैदी बाहर घूमे तो उस पर चौबीस पण दंड दिया जाय और ऐसा कराने वाले व्यक्ति पर अठतालीस पण दंड किया जाय । यदि कोई जेल का कर्मचारी कैदी की जगह बदले, उसके खानेपीने में बाधा डाले, उस पर छियानवे पण दंड, जो किसी कैदी को कोड़े मारे या रिश्वत दिलावे, उसको मध्यम साहस दंड और जो कोई कैदी का वध कर डाले उस पर एक हजार पण दंड किया जाय ।

( ३ ) खरीदी हुई या गिरवी रखी दासी यदि किसी कारण हवालात में बंद कर दी जाय और तब यदि कोई राजपुरुष उसके साथ व्यभिचार करे तो उसे प्रथम साहस दंड दिया जाय । चोर और अकस्मात् विनष्ट पुरुष ( डामरिक ) की पत्नी के साथ ऐसा ही दुर्व्यवहार करने वाले राजपुरुष को मध्यम साहस दंड, और कैद में बंद किसी आर्या स्त्री के साथ ऐसा करने पर उत्तम साहस दंड दिया जाय । यदि कोई कैदी ही ऐसा करे तो उसे प्राणदंड दिया जाय । सुवर्णाध्यक्ष यदि किसी कुलीन स्त्री के साथ दुराचार करे तो उसे भी प्राणदंड दिया जाय । दासी के साथ ऐसा करने पर प्रथम साहस दंड दिया जाय ।

( ४ ) यदि जेलखाने को बिना तोड़े ही कोई कैदी को बाहर निकाल दे तो उसे

कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सर्वाधिकरणरक्षण नामक नवाँ अध्याय समाप्त ।

प्र० ८४ : अ० ९ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८५

(१) एवमर्थचरान् पूर्वं राजा दण्डेन शोधयेत् ।
शोधयेयुश्च शुद्धास्ते पौरजानपदान् दमैः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे सर्वाधिकरणरक्षणं नाम नवमोऽध्यायः
आदितः पञ्चाशीतितमः ।

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मध्यम साहस दंड, यदि तोड़कर निकाले तो प्राणदंड दिया जाय । यदि प्रदेष्टा ऐसा करे तो उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर उसे प्राणदंड की सजा दी जाय ।

( १ ) इस प्रकार राजा को चाहिए कि पहिले वह अपने कर्मचारियों को दंड से शुद्ध करे । फिर वे विशुद्ध हुए राजकर्मचारी दंड-व्यवस्था के द्वारा नगर तथा प्रदेश की जनता को सही रास्ते पर लायें ।

कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सर्वाधिकरणरक्षण नामक नवाँ अध्याय समाप्त ।

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२५ कौ०

प्रकरण ८५# एकाङ्गवधनिष्क्रयः
अध्याय १०

(१) तीर्थघातग्रन्थिभेदोर्ध्वकराणां प्रथमेऽपराधे [सन्दंशच्छेदनं चतु-ष्पञ्चाशतपणो वा दण्डः । द्वितीये छेदनं पणस्य शत्यो वा दण्डः । तृतीये दक्षिणहस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः । चतुर्थे यथाकामी वधः ।

(२) पञ्चविंशतिपणावरेषु कुक्कुटनकुलमार्जारश्वसूकरस्तेयेषु हिंसायां वा चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः, नासाग्रच्छेदनं वा । चण्डालारण्यचराणामर्ध-दण्डः ।

(३) पाशजालकूटावपातेषु बद्धानां मृगपशुपक्षिव्यालमात्स्यानामादाने तच्च तावच्च दण्डः ।

(४) मृगद्रव्यवनान्मृगद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः । बिम्बविहारमृगपक्षि-स्तेये हिंसायां वा द्विगुणो दण्डः ।


एकांग वध अथवा उसकी जगह द्रव्य-दण्ड

( १ ) तीर्थस्थानों में रहने वाले उठाईगीर ( तीर्थघात ), गिरहकट ( ग्रंथिभेद ) और छत फोड़ने वाले ( ऊर्ध्वकर ) व्यक्तियों का अंगूठा तथा कनिष्ठिका उँगली कटवा दी जांय; अथवा उन पर चौवन पण दण्ड किया जाय । दूसरी बार अपराध करने पर उनकी सब उँगलियाँ कटवा दी जाँय अथवा उन पर सौ-पण जुर्माना किया जाय । तीसरी बार यदि वे अपराध करें तो उनका दाहिना हाथ कटवा दिया जाय या उन पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय । चौथी बार भी वे अपराध कर बैठें तो उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

( २ ) यदि कोई व्यक्ति पच्चीस पण से कम कीमत के मुर्गों, नेवले, बिल्ली, कुत्ते और सुअर की चोरी करे या उन्हें मार डाले तो उस पर चौवन पण दण्ड किया जाय या उसकी नाक का अगला हिस्सा काट दिया जाय । यदि वे मुर्गे आदि किसी चाण्डाल के अथवा जंगली हों तो उक्त दण्ड से आधा दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति फाँस कर, जाल बिछाकर और घास-फूस से ढके गढों द्वारा संरक्षित राजकीय मृग तथा अन्य पशु, पक्षी, हिंसक जीव और मछली आदि पकड़े, उससे उनकी कीमत वसूली जाय और उतना ही उस पर जुर्माना किया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति सुरक्षित जंगल के जानवरों तथा लकड़ी आदि की चोरी करे उस पर सौ पण जुर्माना किया जाय । रंग-विरंगी सुंदर चिड़ियों, पालतू हरिणों तथा तोतों को पकड़ने वाले या मारने वाले व्यक्ति पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

प्र० ८५ : अ० १० ] एकाङ्गवध अथवा द्रव्यदण्ड ३८७

(१) कारुशिल्पिकुशीलवतपस्विनां क्षुद्रकद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः । स्थूलकद्रव्यापहारे द्विशतः । कृषिद्रव्यापहारे च । (२) दुर्गमकृतप्रवेशस्य प्रविशतः प्राकारच्छिद्राद्वा निक्षेपं गृहीत्वाऽपसरतः कन्धरावधो द्विशतो वा दण्डः । (३) चक्रयुक्तां नावं क्षुद्रपशुं वापहरत एकपादवधः त्रिशतो वा दण्डः । (४) कूटकाकपण्यक्षारला शलाकाहस्तविषमकारिण एकहस्तवधः, चतुःशतो वा दण्डः । (५) स्तेनपारदारिकयोः साचिव्यकर्मणि स्त्रियाः संगृहीतायाश्च कर्णनासाछेदनं पञ्चशतो वा दण्डः । पुंसो द्विगुणः । (६) महापशुमेकं दासं दासीं वापहरतः प्रेतभाण्डं वा विक्रीणानस्य द्विपादवधः, षट्छतो वा दण्डः । (७) वर्णोत्तमानां गुरूणां च हस्तपादलंघने राजयानवाहनाद्यारोहणे चैकहस्तपादवधः सप्तशतो वा दण्डः ।


( १ ) जो व्यक्ति बढ़इयों, छोटे कारीगरों, कथकों और तपस्वियों की छोटी-छोटी चीजों की चोरी करे उस पर सौ पण दण्ड किया जाय और बड़ी-बड़ी चीजों की चोरी करे तो दो-सौ पण दण्ड किया जाय । खेती के साधन हल आदि चुराने वाले पर भी दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

( २ ) यदि अनधिकारी व्यक्ति किले में प्रवेश करे अथवा परकोटे की दीवार तोड़ कर माल उड़ा ले जाय तो उसके पैर के पीछे की दो मुख्य नसें कटवा दी जाँय, या उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

( ३ ) चक्रयुक्त ( धन, शस्त्र या यंत्र युक्त ) नाव को अथवा छोटे-छोटे पशुओं की चोरी करने वाले का एक पैर कटवा दिया जाय या उस पर तीन-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति जाली कौड़ी, पांसें, अरला और शलाका आदि जुआ संबंधी सामान बनाये, तथा जो व्यक्ति इसी प्रकार की अन्य कूट-कपट की चीजें बनाये, उसका एक हाथ काट दिया, या उस पर चार सौ पण जुर्माना किया जाय ।

( ५ ) चोरों और व्यभिचारियों की दूतियों के नाक, कान काट लिये जाँय या उन पर पाँच सौ पण दण्ड किया जाय । यदि पुरुष ऐसा दूतकर्म करें तो उन पर दुगुना ( एक हजार पण ) दण्ड दिया जाय ।

( ६ ) गाय, भैंस आदि पशुओं, एक दास, एक दासी को चुराने वाले अथवा मुर्दे के कपड़े बेचने वाले पुरुष के दोनों पैर काट लिये जाँय या उस पर छह-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

( ७ ) जो व्यक्ति श्रेष्ठ पुरुषों या गुरुजनों को हाथ-पैर से मारे या राजा की सवारी एवं घोड़े पर चढ़े उसका या तो एक हाथ और एक पैर काट दिया जाय अथवा उस पर सात-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

३८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) शूद्रस्य ब्राह्मणवादिनो देवद्रव्यमवस्तृणतो राजद्विष्टमादिशतो द्विनेत्रभेदिनश्च योगाञ्जनेनान्धत्वमष्टशतो वा दण्डः ।

(२) चोरं पारदारिकं वा मोक्षयतो राजशासनमूनमतिरिक्तं वा लिखतः कन्यां दासीं वा सहिरण्‍यमपहरतः कूटव्यवहारिणो विमांसविक्रयिणश्च वामहस्तद्विपादवधो नवशतो वा दण्डः । मानुषमांसविक्रये वधः ।

(३) देवपशुप्रतिमामनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णरत्नसस्यापहारिण उत्तमो दण्डः शुद्धवधो वा ।

(४)

पुरुषं चापराधं च कारणं गुरुलाघवम् ।
अनुबन्धं तदात्वं च देशकालौ समीक्ष्य च ॥
उत्तमावरमध्यत्वं प्रदेष्टा दण्डकर्मणि ।
राज्ञश्च प्रकृतीनां च कल्पयेदन्तरा स्थितः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे एकाङ्गवधनिष्क्रयो नाम दशमोऽध्यायः; आदितः षडशीतितमः ।

—: ० :—

(१) जो शूद्र अपने को ब्राह्मण बताये और देव-निमित्त द्रव्य का अपहरण करे तथा ज्योतिषी बनकर जो राजा के भावी अनिष्ट को बताये अथवा बगावत करे या किसी की दोनों आँखें फोड़ दे, ऐसे व्यक्ति को औषधियों का सुरमा लगा कर अंधा कर दिया जाय अथवा उस पर आठ-सौ पण जुरमाना किया जाय ।

(२) चोर या व्यभिचारी को छोड़ देने वाले, राजा की आज्ञा को घटा-बढ़ा कर लिखने वाले, आभूषणों सहित कन्या या दासी का अपहरण करने वाले, छल-कपट का व्यवहार करने वाले, अभक्ष्य पशुओं का मांस बेचने वाले, पुरुष का बायाँ हाथ और दोनों पैर काट दिये जाँय, या उस पर नौ-सौ पण दण्ड किया जाय । आदमी का मांस बेचने वाले को प्राण दण्ड की सजा दी जाय ।

(३) देवता के निमित्त पशु, प्रतिमा, मनुष्य, खेत, घर, हिरण्य, सोना, रत्न और अन्न, इन नौ चीजों की जो भी व्यक्ति चोरी करे उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय या उसको पीडारहित प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

(४) राजा और आमात्यों को साथ लेकर प्रदेष्टा को चाहिए कि वह दण्ड देते समय अपराध को, अपराध के कारणों को, अपराधी की हैसियत को, वर्तमान तथा भावी परिणामों को और देश-काल की स्थिति को भली-भाँति सोच समझ ले, तदनन्तर न्याय के अनुसार प्रथम, मध्यम तथा उत्तम आदि दण्डों की सजा सुनाये ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में एकाङ्गवधनिष्क्रय नामक दशवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण ८६## शुद्धश्चित्रश्च दण्डकल्पः
अध्याय ११

(१) कलहे घ्नतः पुरुषं चित्रो घातः । सप्तरात्रस्यान्तः मृते शुद्धवधः पक्षस्यान्तरुत्तमः । मासस्यान्तः पञ्चशतः समुत्थानव्ययश्च ।

(२) शस्त्रेण प्रहरत उत्तमो दण्डः । मदेन हस्तवधः । मोहेन द्विशतः । वधे वधः ।

(३) प्रहारेण गर्भं पातयत उत्तमो दण्डः । भैषज्येन मध्यमः । परिक्लेशेन पूर्वः साहसदण्डः ।

(४) प्रसभं स्त्रीपुरुषघातकाभिसारकनिग्राहकावघोषकावस्कन्दकोपवेधकान् पथि वेश्मप्रतिरोधकान् राजहस्त्यश्वरथानां हिंसकान् स्तेनान् वा शूलानारोहयेयुः ।


शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड

( १ ) कोई व्यक्ति यदि लड़ाई-झगड़े में किसी व्यक्ति को जान से मार डाले तो उसको कष्टपूर्वक प्राणदण्ड ( चित्रघात ) की सजा दी जाय । झगड़ा होने के बाद चोट खाया व्यक्ति यदि सात दिन बाद मरे तो मारने वाले को शुद्ध प्राणदण्ड ( कष्टरहित वध ) दिया जाय । यदि पन्द्रह दिन बाद मरे तो उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । एक महीने के बाद मरे तो पाँच-सौ पण जुर्माना और साथ ही मृतक की दवाई-दारू का सारा व्यय भी मरने वाले से वसूल किया जाय ।

( २ ) किसी शस्त्र द्वारा चोट पहुँचाने पर उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । यदि बल के घमंड से चोट पहुँचाये तो उसका हाथ काट दिया जाय । यदि क्रोधावेश में प्रहार करे तो उस पर दो सौ पण दण्ड दिया जाय । यदि जान से मार डाले तो उसको प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति प्रहार द्वारा गर्भ गिराये उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । औषध द्वारा गर्भ गिराने वाले को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । कठोर काम कराकर गर्भ गिराने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) यदि कोई व्यक्ति बलात्कार से किसी स्त्री या पुरुष की हत्या कर डाले, बलात्कार से किसी स्त्री को अपहरण कर ले जाय, बलात्कार से किसी स्त्री की नाक-

३९०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौथा अधिकरण

(१) यश्चैनान् दहेदपनयेद्वा स तमेव दण्डं लभेत, साहसमुत्तमं वा। (२) हिंस्रस्तेनानां भक्तवासोपकरणाग्निमंत्रदानवैयावृत्यकर्मसूत्तमो दण्डः। परिभाषणमविज्ञाने। हिंस्रस्तेनानां पुत्रदारमसमंत्रं विसृजेत्, समंत्रमाददीत। (३) राज्यकामुकमन्तःपुरप्रधर्षकमटव्यमित्रोत्साहकं दुर्गराष्ट्रदण्डकोपकं वा शिरोहस्तप्रादीपकं घातयेत्। (४) ब्राह्मणं तमः प्रवेशयेत्। (५) मातृपितृपुत्रभ्रात्राचार्यतपस्विघातकं वात्वक्छिरःप्रादीपकं घातयेत्। तेषामाक्रोशे जिह्वाच्छेदः। अङ्गाभिरदने तदङ्गान्मोच्यः।


कान काट ले, धमकी देकर हत्या, चोरी की घोषणा करने वाला, बलात्कार से नगर तथा गाँवों का धन ले जाने वाला; भीत तोडकर सेंध लगाने वाला, रास्ते की धर्म-शालाओं तथा प्याउओं की चोरी करने वाला और राजा के हाथी; घोड़े तथा रथों को नष्ट करने, मारने या चुराने वाला, इन सभी प्रकार के अपराधियों को शूली पर लटका दिया जाय।

(१) इन लोगों को जो दाह-संस्कार या क्रिया-कर्म करे या उनको उठा कर गंगा-प्रवाह आदि के लिए ले जाय उसको भी शूली पर चढ़ाया जाय या उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।

(२) जो लोग हत्यारों को खाना, रहना, वस्त्र, आग और सलाह दें तथा उनके यहाँ नौकरी करें उन्हें भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। जिन्हें यह पता नहीं है कि वे हत्यारे या चोर हैं, उन्हें वाक् ताड़ना दी जाय। हत्यारों और चोरों के स्त्री-पुत्र यदि हत्या-चोरी में शामिल न हों तो उन्हें छोड़ दिया जाय, यदि उन्होंने भी किसी प्रकार की सहायता की हो तो उन्हें गिरफ्तार कर यथोचित दण्ड दिया जाय।

(३) राजसिंहासन को हथियाने की इच्छा रखने वाले, अंतःपुर में व्यर्थ का झमेला खड़ा कर देने वाले, आटवी एवं पुलिंद आदि शत्रु राजाओं को उभाड़ने वाले, किले की सेना तथा बाहर की सेना में बगावत फैला देने वाले, पुरुषों के सिर और हाथ में आग लगाकर उनको कत्ल किया जाय।

(४) यदि ऐसा दुष्कर्म करने वाला कोई ब्राह्मण हो तो उसे आजीवन के लिए काल-कोठरी में बंद कर दिया जाय।

(५) जो व्यक्ति माता, पिता, पुत्र, भाई, आचार्य और तपस्वी की हत्या कर डाले, उसके शिर की खाल उतरवा कर उसमें आग लगायी जाय और तब उसको कत्ल कराया जाय। माता-पिता को गाली देने वाले की जीभ कटवा दी जाय। माता-पिता के किसी अंग को कोई जिस अंग से नोचे-खसोटे उसका वही अंग कटवा दिया जाय।

प्र० ८६ : अ० ११ ] शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड [ ३९१

(१) यदृच्छाघाते पुंसः, पशुयूथस्तेये च शुद्धवधः । दशावरं च यूथं विद्यात् । (२) उदकधारणं सेतुं भिन्दतस्तत्रैवाप्सु निमज्जनम् । अनुदकमुत्तमः साहसदण्डः । भग्नोत्सृष्टकं मध्यमः । (३) विषदायकं पुरुषं स्त्रियं च पुरुषघ्नीमपः प्रवेशयेद्गर्भिणीम् । गर्भिणीं मासावरप्रजाताम् । (४) पतिगुरुप्रजाघातिकामग्निविषदां सन्धिच्छेदिकां वा गोभिः पादयेत् । (५) विवीतक्षेत्रखलवेश्मद्रव्यहस्तिवनादीपिकमग्निना दाहयेत् । (६) राजाक्रोशकमन्त्रभेदकयोरनिष्टप्रवृत्तिकस्य ब्राह्मणमहानसावलेहिनश्च जिह्वामुत्पाटयेत् । (७) प्रहरणावरणास्तेनमनायुधीयमिषुभिर्घातयेत् । आयुधीयस्योत्तमः ।


( १ ) जो व्यक्ति किसी दूसरे को अचानक ही मार डाले या पशुओं के झुंड की तथा घोड़ों की चोरी करे उसको शुद्ध प्राणदण्ड दिया जाय । कम-से-कम दस पशुओं का एक झुंड समझना चाहिए ।

( २ ) जो व्यक्ति पानी के बाँध को तोड़े, उसको वहीं जल में डुबा कर मार दिया जाय । यदि जल-बाँध में पानी न हो तो तोड़ने वाले को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । यदि वह पहिले ही से टूटा-फूटा हो और तब उसे तोड़ा जाय तो मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) विष देकर किसी की हत्या करने वाले स्त्री-पुरुष को जल में डुबाकर खत्म कर दिया जाय, बशर्ते कि वह स्त्री गर्भिणी न हो। यदि गर्भिणी हो तो बच्चा पैदा होने के एक मास बाद उसका ऐसा ही प्राणांत किया जाय ।

( ४ ) अपने पति, गुरु और बच्चे की हत्या करने वाली, आग लगाने वाली, विष देने वाली, सेंध लगाकर चोरी करने वाली, स्त्री को गायों के पैरों के नीचे कुचलवा कर मारा जाय ।

( ५ ) जो व्यक्ति चारागाह, खेत, खलिहान, घर और लकड़ियों तथा हथियारों से सुरक्षित जंगल में आग लगा दे उसको आग में ही जला दिया जाय ।

( ६ ) जो व्यक्ति राजा को गाली दे, गुप्त रहस्य को खोल दे, राजा के अनिष्ट को फैलाये और ब्राह्मण की भोजनशाला से जबर्दस्ती अन्न लेकर खाने लगे उसकी जिह्वा कटवा दी जाय ।

( ७ ) जो आयुधजीवी न होकर भी हथियार और कवच आदि चुराये, उसे सामने खड़ा करके बाणों से मरवा दिया जाय । यदि वह आयुधजीवी हो तो उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।

३९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

३९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) मेढ्रफलोपघातिनस्तदेव छेदयेत् । (२) जिह्वानासोपघाते सन्दंशवधः । (३) एते शास्त्रेष्वनुगताः क्लेशदण्डा महात्मनाम् । अक्लिष्टानां तु पापानां धर्म्यः शुद्धवधः स्मृतः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे शुद्धचित्रदण्डकल्पो नाम एकादशोऽध्यायः आदितोः सप्ताशीतितमः ।

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( १ ) यदि कोई व्यक्ति किसी का लिंग और अण्डकोश काट डाले उसका भी लिंग और अण्डकोश कटवा दिया जाय ।

( २ ) किसी की जीभ और नाक काट देने वाले व्यक्ति की कनिष्ठिका और अंगूठा कटवा दिया जाय ।

( ३ ) इस प्रकार के कठोर मृत्युदण्ड मनु आदि महात्माओं के धर्मशास्त्र विषयक ग्रन्थों में प्रतिपादित हैं । इनसे हल्के पापकर्मों के लिए शुद्ध प्राणदण्ड ही धर्मानुकूल समझना चाहिए ।

कण्टकशोधक नामक चतुर्थ अधिकरण में शुद्धचित्रदण्ड नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ८७ अध्याय १२

कन्याप्रकर्म


(१) सवर्णामप्राप्तफलां कन्यां प्रकुर्वतो हस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः । मृतायां वधः । (२) प्राप्तफलां प्रकुर्वतो मध्यमाप्रदेशिनीवधो द्विशतो वा दण्डः । पितुश्चावहीनं दद्यात् । (३) न च प्राकाम्यमकामायां लभेत । सकामायां चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । स्त्रियास्त्वर्धदण्डः । (४) परशुल्कावरुद्धायां हस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः शुल्कदानं च । (५) सप्तार्तवप्रजातां वरणादूर्ध्वमलभमानां प्रकृत्य प्राकामी स्यात्, न च पितुरवहीनं दद्यात् । ऋतुप्रतिरोधिभिः स्वाम्यादपक्रामति ।


कुँवारी कन्या से संभोग करने का दण्ड

( १ ) जो व्यक्ति अपनी जाति की रजोधर्म रहित ( अरजस्का ) कन्या को दूषित करे उसका हाथ कटवा दिया जाय अथवा उस पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि वह बलात्कार के कारण मर जाय तो अपराधी को प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

( २ ) यदि कोई व्यक्ति रजस्वला हो चुकी कन्या को दूषित करे तो अपराधी की तर्जनी और मध्यमा उगलियाँ कटवा दी जाँय अथवा उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय और लड़की के पिता को वह हर्जाना ( अवहीन ) दे ।

( ३ ) संभोग के लिए इच्छा न करने वाली कन्या से गमन करने पर इच्छापूर्ति नहीं होती है । संभोग की इच्छा करने वाली स्त्री से गमन करने पर पुरुष को चौवन पण और स्त्री को सत्ताईस पण दण्ड किया जाय ।

( ४ ) जिस लड़की की सगाई हो चुकी हो उसके साथ संभोग करने वाले का हाथ काट दिया जाय या उस पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय और सगाई का सारा खर्च उससे वसूल किया जाय ।

( ५ ) सगाई के बाद सात मासिक धर्म होने तक भी यदि लड़की का विवाह न किया जाय तो उसका होने वाला पति लड़की को यथेच्छा भोग सकता है, और लड़की के पिता को वह हर्जाना भी न दे । क्योंकि मासिकधर्म हो जाने के बाद लड़की पर पिता का कोई अधिकार नहीं रह जाता है ।

३९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

३९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) त्रिवर्षप्रजातातार्तवायास्तुल्यो गन्तुमदोषः । ततः परमतुल्योऽप्यनलङ्कृतायाः । पितृद्रव्यादाने स्तेयं भजेत ।

(२) परमुद्दिश्यान्यस्य विन्दतो द्विशतो दण्डः । न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ।

(३) कन्यामन्यां दर्शयित्वान्यां प्रयच्छतः शत्यों दण्डस्तुल्यायां, हीनायां द्विगुणः ।

(४) प्रकर्मण्यकुमार्याश्चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । शुल्कव्ययकर्मणी च प्रतिदद्यादवस्थाय तज्जातं पश्चात्कृता द्विगुणं दद्यात् ।

(५) अन्यशोणितोपधाने द्विशतो दण्डः । मिथ्याभिशंसिनश्च पुंसः । शुल्कव्ययकर्मणी च जीयेत । न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ।

(६) स्त्री प्रकृता सकामा समाना द्वादशपणं दण्डं दद्यात्, प्रकर्त्री


( १ ) यदि मासिक धर्म होने पर भी कन्या का तीन वर्ष तक विवाह न किया जाय तो उसकी जाति का कोई भी पुरुष उसके साथ संभोग कर सकता है । यदि मासिक धर्म होते हुए तीन वर्ष से अधिक गुजर जाँय तो किसी भी जाति का पुरुष उसको अपनी पत्नी बना सकता है इसमें कोई दोष नहीं, किन्तु वह पुरुष लड़की के पिता के बनवाये आभूषण आदि नहीं ले जा सकता है । यदि वह पुरुष लड़की के पिता के आभूषण आदि वापस न करे तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय ।

( २ ) दूसरे के लिए कही हुई स्त्री को 'वह पुरुष मैं ही हूँ' ऐसा कहकर जो अन्य पुरुष उपभोग करे उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । स्त्री की इच्छा न होने पर कोई भी पुरुष उससे संभोग न करे ।

( ३ ) विवाह से पहिले जिस कन्या को दिखाया गया हो, विवाह में यदि उसी जाति की दूसरी कन्या दी जाय तो उस व्यक्ति पर सौ-पण दण्ड किया जाय । यदि उसकी जगह कोई नीच जाति की कन्या दी जाय तो दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

( ४ ) जो पुरुष क्षतयोनि स्त्री को अक्षतयोनि कहकर दुबारा उसका विवाह कराये उस पर चौवन पण दण्ड किया जाय, और उससे शुल्क तथा अन्य खर्चा भी वसूल किया जाय । यदि वह ऐसा ही कह कर तीसरी बार विवाह कराये तो उस पर दुगुना जुर्माना ( १०८ पण ) किया जाय ।

( ५ ) जो स्त्री अपनी योनि-क्षीणता दिखाने के लिए दूसरे का खून अपने कपड़ों पर लगाये उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार जो पुरुष अक्षतयोनि स्त्री को क्षतयोनि बताये उस पर भी दो-सौ पण दण्ड किया जाय तथा शुल्क एवं विवाह-व्यय भी उससे वसूल किया जाय । स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उससे कोई भी संभोग नहीं कर सकता है ।

( ६ ) संभोग की इच्छा से कोई स्त्री यदि अपने समान जाति वाले पुरुष से

प्र० ८७ : अ० १२ ] कुँवारी कन्या से संभोग का दण्ड ३९५

द्विगुणम् । अकामायाः शत्यो दण्डः, आत्मरागार्थं शुल्कदानं च । स्वयं प्रकृता राजदास्यं गच्छेत् । (१) बहिर्ग्रामस्य प्रकृतायां मिथ्याभिशंसने च द्विगुणो दण्डः । (२) प्रसह्य कन्यामपहरतो द्विशतः, ससुवर्णामुत्तमः । बहूनां कन्यापहारिणां पृथग्यथोक्ता दण्डाः । (३) गणिकादुहितरं प्रकुर्वतश्चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । शुल्कं मातुर्भोगः षोडशगुणः । (४) दासस्य दास्या वा दुहितरमदासीं प्रकुर्वतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः, शुल्काबन्ध्यदानं च । निष्क्रयानुरूपां दासीं प्रकुर्वतो द्वादशपणो दण्डः, वस्त्राबन्ध्यदानं च । (५) साचिव्यावकाशदाने कर्तृसमो दण्डः ।

योनिक्षत कराये तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि वह स्वयं ही अपनी योनि को क्षत करे तो उस पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । पुरुष की इच्छा न रखती हुई भी जो स्त्री क्षणिक आनन्द के लिए किसी पुरुष से अपनी योनि क्षीण कराती है उस पर सौ पण दण्ड किया जाय और उस पुरुष को वह संभोग शुल्क दे । जो स्त्री अपनी इच्छा से संभोग कराये, उसको चाहिए कि वह राजदासी बन जाय ।

( १ ) गाँव के बाहर निर्जन स्थान में संभोग कराने वाली स्त्री पर चौबीस पण जुरमाना किया जाय और यदि पुरुष संभोग करके मुकर जाय तो उस पर अठतालीस पण दण्ड किया जाय ।

( २ ) किसी कन्या का बलात् अपहरण करने वाले पुरुष पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । आभूषणों से युक्त कन्या का बलात् अपहरण करने वाले को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । अपहरण में यदि अनेक व्यक्तियों का हाथ हो तो प्रत्येक को यही दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) वेश्या की लड़की के साथ बलात्कार करने वाले पर चौवन पण दण्ड किया जाय । और दंड से सोलह गुनी फीस ( ८६४ पण ) वह लड़की की माता को अदा करे ।

( ४ ) किसी भी दास या दासी की लड़की के साथ संभोग करने वाले पुरुष पर चौबीस पण दण्ड किया जाय और उससे शुल्क तथा आभूषण आदि भी वसूल किये जाँय । दासता से छुड़ाने के बराबर धन देकर जो व्यक्ति किसी दासी से संभोग करे उस पर बारह पण जुरमाना किया जाय और उससे दासी स्त्री के लिए वस्त्र तथा जेवरात भी वसूल कर लिए जाँय ।

( ५ ) कन्या को दूषित करने में जो भी सहायता करे अथवा मौका या जगह दे उसे भी अपराधी के ही समान दण्ड दिया जाय ।

३९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) प्रोषितपतिकामपचरन्तीं पतिबन्धुस्तत्पुरुषो वा संगृह्णीयात् । संगृहीता पतिमाकांक्षेत । पतिश्चेत् क्षमेत, विसृज्येतोभयम् । अक्षमायां स्त्रियाः कर्णनासाच्छेदनम् । वधं जारश्च प्राप्नुयात् ।

(२) जारं चोर इत्यभिहरतः पञ्चशतो दण्डः । हिरण्येन मुञ्चतस्तदष्टगुणः ।

(३) केशाकेशीकं संग्रहणम् । उपलिङ्गनाद्वा शरीरोपभोगानां तज्जातेभ्यः स्त्रीवचनाद्वा ।

(४) परचक्राटवीहतामोघप्रव्यूढामरण्येषु दुर्भिक्षे वा त्यक्तां प्रेतभावोत्सृष्टां वा परस्त्रियं निस्तारयित्वा यथासम्भाषितं समुपभुञ्जीत । जातिविशिष्टामकामामपत्यवतीं निष्क्रयेण दद्यात् ।

(५) चोरहस्तान्नदीवेगाद् दुर्भिक्षाद्देशविभ्रमात् ।
निस्तारयित्वा कान्ताराद्भ्रष्टां त्यक्तां मृतेति वा ॥


( १ ) जिस स्त्री का पति विदेश में हो, यदि वह व्यभिचार कराये तो उसका देवर या नौकर उसको नियंत्रण में रखे । उनके नियन्त्रण में रहकर वह स्त्री अपने पति के आने की प्रतीक्षा करे । यदि पति उसके अपराध को क्षमा कर दे तो, जार सहित उसको दण्ड से बरी किया जाय, यदि क्षमा न करे तो स्त्री के नाक-कान काट दिये जाँय और उसके जार को प्राणदंड की सजा दी जाय ।

( २ ) व्यभिचार छिपाने के लिए यदि कोई रक्षक पुरुष जार को चोर बताये तो उस पर पाँच सौ पण जुरमाना किया जाय । रक्षक पुरुष यदि हिरण्य की रिश्वत लेकर जार को छोड़ दे तो उस पर रिश्वत का अठगुना जुरमाना किया जाय ।

( ३ ) यदि कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ फँसी हो तो उसका पता उसकी इन चेष्टाओं से किया जाय : यदि वह रास्ते में चलती हुई दूसरी स्त्री की चुटिया पकड़े, यदि उसके शरीर पर संभोग चिह्न लक्षित हों, यदि कामोत्तेजना के लिए अपने शरीर पर उसने चंदन आदि का लेप किया हो, यदि वह पुरुषों से इशारों से बात करे, यदि वह बात-चीत से स्वयं ही प्रकट कर दे ।

( ४ ) जो पुरुष शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से रोग या मूर्च्छा से त्यागी हुई पराई स्त्रियों का उद्धार करे, वह उस स्त्री की रजामन्दी से उसके साथ तृप्त होकर संभोग कर सकता है । यदि वह स्त्री कुलीन हो, समान जाति की होने पर भी वह उद्धारकर्ता से संभोग की इच्छा न करे और बाल-बच्चों वाली हो तो उद्धार करने वाला उसको उसके पति के पास सौंप कर उससे यथोचित पुरस्कार प्राप्त करे ।

( ५ ) शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से,