भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ८४ : अ० ६ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८३

देशं न पृच्छति, अदेयं देशं पृच्छति, कार्यमदेशेनातिवाहयति, चलेनातिहरति, कालहरणेन श्रान्तमपवाहयति, मार्गापन्नं वाक्यमुत्क्रमयति, मतिसाहाय्यं साक्षिभ्यो ददाति, तारितानुशिष्टं कार्यं पुनरपि गृह्णाति, उत्तममस्य साहसदण्डं कुर्यात् । पुनरपराधे द्विगुणं, स्थानाद्द्व्यवरोपणं च ।
(१) लेखकश्चेदुक्तं न लिखति अनुक्तं लिखति, दुरुक्तमुपलिखति, सूक्तमुल्लिखति, अर्थोत्पत्तिं वा विकल्पयतीति पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । यथापराधं वा ।
(२) धर्मस्थः प्रदेष्टा वा हैरण्यमदण्ड्यं क्षिपति, क्षेपद्विगुणमस्मै दण्डं दद्यात् । हीनातिरिक्ताष्टगुणं वा । शारीरदण्डं क्षिपति, शारीरमेव दण्डं भजेत । निष्क्रयद्विगुणं वा । यं वा भूतमर्थं नाशयत्यभूतमर्थं करोति, तदष्टगुणं दण्डं दद्यात् ।
(३) धर्मस्थीयाच्चारकान्निःसारयतो बन्धनागाराच्छय्यासनभोजनोच्चारसञ्चारं रोधबन्धनेषु त्रिपणोत्तरा दण्डाः कर्तुः कारयितुश्च ।


कर अनुपयोगी बातें पूछे, यदि बिना गवाह के किसी मामले का निर्णय दे दे, यदि सच्चे साक्षी को कपट की बातों में डालकर झूठा बना दे, यदि व्यर्थ की बातों में साक्षी को उलझाये रखने के बाद छोड़ दे, यदि साक्षी के कथन के क्रम को उलट-पुलट कर लिखे, यदि बीच-बीच में साक्षियों की सहायता करे, यदि निर्णीत मामले को फिर से जिरह में रखे, ऐसे न्यायाधीश को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । दुबारा भी वह यही अपराध करे तो इससे दुगुना दण्ड दिया जाय और उसको पदच्युत किया जाय ।

( १ ) मुहर्रिर ( लेखक ) यदि बयानों को सही-सही न लिखे, न कही हुई बात को लिखे, बुरी बात को अच्छी तथा अच्छी बात को बुरी तरह लिखे या बात के अभिप्राय को ही बदल कर लिखे, उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय या अपराध के अनुसार उसको यथोचित दण्ड दिया जाय ।

( २ ) धर्मस्थ या प्रदेष्टा यदि किसी निरपराधी को सुवर्ण दण्ड दें तो उन पर उससे दुगुना दण्ड किया जाय । यदि वे दण्ड में कमी वेशी करें तो उनसे उसका आठ गुना दण्ड वसूल किया जाय । यदि वे किसी निरपराधी को शारीरिक दण्ड दें तो उनको उससे दुगुना शारीरिक दण्ड दिया जाय । यदि वे शारीरिक दण्ड की जगह अर्थदंड करें तो उनसे उसका दुगुना अर्थदंड वसूल किया जाय । न्यायोचित धन को नष्ट करने और अन्यायपूर्ण धन का संग्रह करने वाले धर्मस्थ या प्रदेष्टा को उस धनराशि का अठगुना दंड दिया जाय ।

( ३ ) न्यायाधीश द्वारा हवालात में बंद कैदी को यदि कोई जेल का कर्मचारी