कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३८२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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आ विंशतिपणमूल्यादिति द्विशतः । आ त्रिंशत्पणमूल्यादिति पञ्चशतः । आ चत्वारिंशत्पणमूल्यादिति साहस्त्रः । आ पञ्चाशतपणमूल्यादिति वधः । (१) प्रसह्य दिवा रात्रौ वान्तर्याभिकमपहरतोऽर्धमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः । प्रसह्य दिवा रात्रौ वा सशस्रस्यापहरश्चतुर्भागमूल्येष्वेव एव द्विगुणा दण्डाः । (२) कुटुम्बिकाध्यक्षमुख्यस्वामिनां कूटशासनमुद्राकर्मसु पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः, यथापराधं वा । (३) धर्मस्थश्चेद्गदमानं पुरुषं तर्जयति, भर्त्सयत्यपसारयति, अभिग्रसते वा, पूर्वमस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । वाक्पारुष्ये द्विगुणम् । (४) पृच्छयं न पृच्छति, अपृच्छयं पृच्छति, पृष्ट्वा वा विसृजति, शिक्षयति, स्मारयति पूर्वं ददाति वेति, मध्यममस्मै साहसदण्डं कुर्यात् । देयं
जाय । पाँच पण कीमती वस्तु के लिए अठतालीस पण दण्ड, दस पण कीमती वस्तु के लिए प्रथम साहस दण्ड, बीस पण कीमती वस्तु के लिये दो सौ पण दण्ड, तीस पण तक की वस्तु के लिए पाँच सौ पण दण्ड, चालीस पण तक की वस्तु के लिए एक हजार पण दण्ड और पचास पण मूल्य की वस्तु चुराने वाले को प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।
(१) किसी रक्षित वस्तु पर दिन या रात में जबरदस्ती डाका डालने पर आधा माष से दो माष तक की वस्तु के लिए छह पण दण्ड दिया जाय । यदि चोर हथियारबन्द हो तो ३/८ माष मूल्य की वस्तु पर ही छह पण दण्ड किया जाय ।
(२) यदि जन-साधारण जाली दस्तावेज या जाली नोट अथवा जाली मुद्राएँ बनायें तो उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय, यदि सुवर्णाध्यक्ष आदि ऐसा कार्य करें तो उन्हें मध्यम साहस दण्ड, यदि गाँव का मुखिया करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड और यदि समाहर्त्ता ही कर बैठे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय, अथवा अपराध के अनुसार यथोचित दण्ड निर्धारित किया जाय ।
(३) यदि न्यायाधीश (धर्मस्थ) अदालत में किसी अभियोक्ता या अभियुक्त को डराये, धमकाये या घुड़के या बाहर निकाल दे, या उससे रिश्वत ले तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि न्यायाधीश गाली दे तो इससे दुगुना दण्ड दिया जाय ।
(४) यदि न्यायाधीश, साक्षी से पूछने योग्य बातों को न पूछकर न पूछी जाने योग्य बातों को पूछे या बिना ही उत्तर पाये बात को छोड़ दे या गवाह को सिखाये या याद दिलाये या उसकी अधूरी बात को स्वयं ही पूरी कर दे, तो उसे मध्यम दण्ड दिया जाय । यदि किसी विचारणीय वस्तु के संबंध में उपयोगी बातों को न पूछ