कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 477, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ८७ अध्याय १२
कन्याप्रकर्म
(१) सवर्णामप्राप्तफलां कन्यां प्रकुर्वतो हस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः । मृतायां वधः । (२) प्राप्तफलां प्रकुर्वतो मध्यमाप्रदेशिनीवधो द्विशतो वा दण्डः । पितुश्चावहीनं दद्यात् । (३) न च प्राकाम्यमकामायां लभेत । सकामायां चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । स्त्रियास्त्वर्धदण्डः । (४) परशुल्कावरुद्धायां हस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः शुल्कदानं च । (५) सप्तार्तवप्रजातां वरणादूर्ध्वमलभमानां प्रकृत्य प्राकामी स्यात्, न च पितुरवहीनं दद्यात् । ऋतुप्रतिरोधिभिः स्वाम्यादपक्रामति ।
कुँवारी कन्या से संभोग करने का दण्ड
( १ ) जो व्यक्ति अपनी जाति की रजोधर्म रहित ( अरजस्का ) कन्या को दूषित करे उसका हाथ कटवा दिया जाय अथवा उस पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि वह बलात्कार के कारण मर जाय तो अपराधी को प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।
( २ ) यदि कोई व्यक्ति रजस्वला हो चुकी कन्या को दूषित करे तो अपराधी की तर्जनी और मध्यमा उगलियाँ कटवा दी जाँय अथवा उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय और लड़की के पिता को वह हर्जाना ( अवहीन ) दे ।
( ३ ) संभोग के लिए इच्छा न करने वाली कन्या से गमन करने पर इच्छापूर्ति नहीं होती है । संभोग की इच्छा करने वाली स्त्री से गमन करने पर पुरुष को चौवन पण और स्त्री को सत्ताईस पण दण्ड किया जाय ।
( ४ ) जिस लड़की की सगाई हो चुकी हो उसके साथ संभोग करने वाले का हाथ काट दिया जाय या उस पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय और सगाई का सारा खर्च उससे वसूल किया जाय ।
( ५ ) सगाई के बाद सात मासिक धर्म होने तक भी यदि लड़की का विवाह न किया जाय तो उसका होने वाला पति लड़की को यथेच्छा भोग सकता है, और लड़की के पिता को वह हर्जाना भी न दे । क्योंकि मासिकधर्म हो जाने के बाद लड़की पर पिता का कोई अधिकार नहीं रह जाता है ।