कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४०२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) रूपाजीवायाः प्रसह्योपभोगे द्वादशपणो दण्डः ।
(२) बहूनामेकामधिचरतां पृथक् पृथक् चतुर्विंशतिपणो दण्डः ।
(३) स्त्रियमयोनौ गच्छतः पूर्वः साहसद्ण्डः । पुरुषमधिमेहतश्च ।
(४) मैथने द्वादशपणः तिर्यग्योनिष्वनात्मनः ।
दैवतप्रतिमानां च गमने द्विगुणः स्मृतः ॥
(५) अदण्ड्यदण्डने राज्ञो दण्डस्त्रिंशद्गुणोऽम्भसि ।
वरुणाय प्रदातव्यो ब्राह्मणेभ्यस्ततः परम् ॥
(६) तेन तत्पूयते पापं राज्ञो दण्डापचारजम् ।
शास्ता हि वरुणो राज्ञां मिथ्या व्याचरतां नृषु ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे अतिचारदण्डो नाम त्रयोदशोऽध्यायः, आदित एकोननवतितमः ।
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यदि संन्यासिनी कामातुर होकर ऐसा कराये तो उस पर भी चौबीस पण दण्ड किया जाय ।
( १ ) वेश्या के साथ बालात् व्यभिचार करने पर बारह पण दण्ड दिया जाय ।
( २ ) यदि अनेक व्यक्ति एक स्त्री के साथ बारी-बारी से संभोग करें तो एक-एक को चौबीस-चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) यदि कोई पुरुष किसी स्त्री के गुदा या मुख में संभोग करें तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । लौंडेबाजी करने पर भी यही दण्ड किया जाय ।
( ४ ) गो आदि पशुओं से समागम करने वाले पातकी पर बारह पण और देव-प्रतिमाओं के साथ गमन करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय ।
( ५ ) जो राजा अदण्डनीय व्यक्ति को दण्ड दे, प्रजा को चाहिए कि वह उस दण्ड का तीस गुना दण्ड राजा से वसूल करे । वह अर्थ दण्ड पहिले वरुण देवता के निमित्त पानी में छोड़ दिया जाय और बाद में ब्राह्मणों को बाँट दिया जाय ।
( ६ ) इस प्रकार अनुचित दण्ड के वसूलने से राजा को जो पाप लगा है वह छूट जाता है, क्योंकि मनुष्यों के ऊपर अनुचित व्यवहार करने वाले राजा पर वरुण-देव ही शासन करता है ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में अतिचारदण्ड नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
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