कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ९० | ## कोशाभिसंहरणम् |
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| अध्याय २ |
(१) कोशमकोशः प्रत्युत्पन्नार्थकृच्छ्रः संगृह्णीयात्। (२) जनपदं महान्तमल्पप्रमाणं वा देवमातृकं प्रभूतधान्यं धान्यस्यांशं तृतीयं चतुर्थं वा याचेत। यथासारं मध्यमवरं वा। (३) दुर्गसेतुकर्मवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्मोपकारिणं प्रत्यन्तमल्पप्रमाणं वा न याचेत। (४) धान्यपशुहिरण्यादिनिविशमानाय दद्यात्। चतुर्थमंशं धान्यानां बीजभक्तशुद्धं च हिरण्येन क्रीणीयात्। (५) अरण्यजातं श्रोत्रियस्वं च परिहरेत्। तदप्यनुग्रहणे क्रीणीयात्।
कोष का अधिकाधिक संग्रह
(१) खजाने के कम हो जाने या अकस्मात् ही अर्थसङ्कट उपस्थित हो जाने पर राजा को कोष-सञ्चय करना चाहिए।
(२) बड़े या छोटे ऐसे जनपदों से अन्न का तीसरा या चौथा हिस्सा राज्यकर प्रजा की अनुमति से वसूल किया जाय, जहाँ का जीवन वृष्टि पर निर्भर हो और जहाँ काफी अनाज पैदा होता हो। इसी प्रकार मध्यम श्रेणी के या छोटे जनपदों से भी अन्न संग्रह किया जाय।
(३) किन्तु जो जनपद मिलों, मकानों व्यापारिक मार्गों, खाली मैदानों, खानों और लकड़ी-हाथी के जंगलों द्वारा राजा तथा प्रजा का उपकार करते हों, जो प्रदेश राज्य की सीमा पर हों और जिनके पास अन्न आदि बहुत थोड़ा हो, उनसे यह राज्य-कर न लिया जाय।
(४) नये बसने वाले किसानों को अन्न, बैल, पशु और धन सरकार की ओर से सहायतार्थ दिया जाय। इस तरह के किसानों से राजा उनकी उपज का चौथा हिस्सा खरीद ले और फिर बीज तथा उनके गुजारे लायक छोड़कर बाकी भी खरीद ले।
(५) जंगल में पैदा हुए तथा श्रोत्रिय द्वारा पैदा किये अन्न में राजा हिस्सा न ले। बीज और खाने योग्य अन्न को छोड़कर उसमें से भी राजा खरीद सकता है।