कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ८९ : अ० १ ] राजद्रोही अधिकारियों हेतु दण्ड-विधि ४११
विक्रमेत । ततो राजा दूष्यदण्डोपनतानेव प्रेषयेत् । फल्गुबलतीक्ष्णयुक्ता- निति समानाः सर्व एव योगाः ।
(१) तेषां च पुत्रेष्वनुक्षिपत्सु यो निर्विकारः स पितृदायं लभेत । एव- मस्य पुत्रपौत्राननुवर्तते राज्यमपास्तपुरुषदोषमिति ।
(२) स्वपक्षे परपक्षे वा तूष्णीं दण्डं प्रयोजयेत् । आयत्यां च तदात्वे च क्षमावानविशङ्कितः ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमाधिकरणे दाण्डकार्मिकं नाम प्रथमोऽध्यायः,
आदितो नवतितमः ।
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सेनापति पहिले कुछ उपकार करे और बाद में उनसे अलग होकर उनसे झगड़ा करता रहे । तदनंतर राजा कुछ सेना के साथ उन्हें दूसरे द्रोहियों को शांत करने के लिए भेजे । तदनंतर उनके साथ पूर्ववत् व्यवहार किया जाय ।
( १ ) वध किये गये द्रोही महामात्रों में वही पुत्र उत्तराधिकारी हो सकता है जो राजा की निन्दा न करे और जो राजा से पिता की हत्या का बदला लेने का ख्याल न करे । यदि कोई पुरुष राजा के विरुद्ध कोई संकल्प मन में न करे तो उसके पुत्र-पौत्र आदि बेखटके अपनी पैतृक संपति को भोग सकते हैं ।
( २ ) इस प्रकार क्षमाशील राजा को चाहिए कि वह वर्तमान और भविष्य में बिना किसी शंका के उचित रूप से अपने तथा दूसरे के पक्ष में इस गूढ़ दण्ड का प्रयोग करे ।
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में दण्डकर्मिक नामक
पहला अध्याय समाप्त ।
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