कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१९
(१) प्रत्यासन्नो वा दूष्यस्य सत्त्री प्रणिहितमभिषेकभाण्डममित्रशासनं च । कापटिकमुखेन आचक्षीत, कारणं च ब्रूयात् । (२) एवं दूष्येष्वधार्मिकेषु च वर्तेत । नेतरेषु । (३) पक्वं पक्वमिवारामात् फलं राज्यादवाप्नुयात् । आत्मच्छेदभयादामं वर्जयेत् कोपकारकम् ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे कोषाभिसंहरणं नाम द्वितीयोऽध्यायः, आदित एकनवतितमः ।
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( १ ) अथवा दूष्य के पास रहता हुआ सत्त्री नामक गुप्तचर दूष्य के घर में रखे राज्याभिषेक तथा शत्रु के लेख की सूचना कापटिक गुप्तचर के द्वारा राजा तक पहुँचा दे । उसका कारण यह सिद्ध किया जाय कि वह दूष्य राजा को मारकर उसकी जगह अपना अभिषेक कराना चाहता है । इसी अपराध में उसका सब कुछ ले लिया जाय ।
( २ ) अपने कोष की वृद्धि के लिए राजा इस प्रकार के उपायों का प्रयोग दूष्यों और अधार्मिक व्यक्ति पर ही करे, दूसरों पर नहीं ।
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह दुष्ट पुरुषों का धन उसी प्रकार ले ले जिस प्रकार वाटिका से पके हुए फल को लिया जाता है; किन्तु धर्मात्मा पुरुषों का धन वह उसी प्रकार छोड़ दे जैसे कच्चे फल को छोड़ दिया जाता है । कच्चे फल के समान धर्मात्मा पुरुषों से वसूला गया धन प्रजा के कोप का कारण बन जाता है ।
योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में कोषाभिसंहरण नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
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