भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ९१भृत्यभरणीयम्
अध्याय ३

(१) दुर्गजनपदशक्त्या भृत्यकर्म समुदयपादेन स्थापयेत् । कार्यसाधनसहेन वा भृत्यलाभेन शरीरमवेक्षेत, न धर्मार्थौ पीडयेत् । (२) ऋत्विगाचार्यमन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजराजमातृराजमहिष्योऽष्टचत्वारिंशत्साहस्राः । एतावता भरणे नानास्वाद्यत्वमकोपकं चैषां भवति । (३) दौवारिकान्तर्वंशिकप्रशास्तृसमाहर्तृसन्निधातारश्चतुर्विंशतिसाहस्राः । एतावता कर्मण्या भवन्ति । (४) कुमारकुमारमातृनायकपौरव्यावहारिककार्मान्तिकमन्त्रिपरिषद्राष्ट्रपालान्तपालाश्च द्वादशसाहस्राः । स्वामिपरिबन्धबलसहाया ह्येतावता भवन्ति ।


भृत्यों का भरण पोषण

(१) दुर्ग और जनपद की शक्ति के अनुसार नौकरों को रखा जाय और राज्य की आय का चौथा भाग उनके भरण-पोषण पर व्यय किया जाय । अथवा कार्य कुशल भृत्य जितने भी वेतन पर मिलें, उन्हें नियुक्त किया जाय, किन्तु आमदनी के स्तर पर अवश्य ध्यान रखा जाय । कहीं ऐसा न हो कि आमदनी कम और खर्चा अधिक हो जाय । ऐसा कोई भी कार्य न किया जाय जिससे धर्म और अर्थ की व्यर्थ क्षति हो ।

(२) ऋत्विक्, आचार्य, मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, राजमाता और पटरानी, इन्हें प्रतिवर्ष अठतालीस हजार पण वेतन (वृत्ति) दिया जाय । इनके भरण-पोषण के लिए इतना यथेष्ट है और ऐसी स्थिति में राजा के लिए भारस्वरूप बन कर उसके कोप का कारण भी नहीं हो सकते हैं ।

(३) द्वारपाल (दौवारिक), अंतःपुर रक्षक (अन्तर्वंशिक), आयुधाध्यक्ष (प्रशास्ता), कर वसूल करने वाला अधिकारी (समाहर्त्ता) और भांडागाराध्यक्ष (सन्निधाता), इनको प्रति वर्ष चौबीस हजार पण वेतन दिया जाय । इतना वेतन देने में ये अपने कार्यों को भली भाँति करते रहेंगे ।

(४) युवराज के भाई (कुमार), उन भाइयों की मातायें या धाय (कुमार