कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) हीनश्चेत् सर्वत्रानुप्रणतस्तिष्ठेत् सन्धिमुपेयात् । आरण्योऽग्निरिव हि दुःखामर्षजं तेजो विक्रमयति । मण्डलस्य चानुग्राह्यो भवति । (२) संहितश्चेत् ‘परप्रकृतयो लुब्धक्षीणापचकिताः प्रत्यादानभयाद्वा नोपगच्छन्ति’ इति पश्येद्धीनोऽपि विगृह्णीयात् । (३) विगृहीतश्चेत् ‘प्रकृतयो लुब्धक्षीणापचरिताः विग्रहोद्विग्ना वा मां नोपगच्छन्ति’ इति पश्येत् । ज्यायानपि सन्धीयेत, विग्रहोद्वेगं वा शमयेत् । ‘व्यसनयौगपद्ये गुरुव्यसनोऽस्मि, लघुव्यसनः परः सुखेन प्रतिकृत्य व्यसन-मात्मनोऽभियुज्यात्’ इति पश्येत् । ज्यायानपि सन्धीयेत । (४) सन्धिविग्रहयोश्चेत् परकर्शनमात्मोपचयं वा नाभिपश्येत्, ज्याया-नप्यासीत् । (५) परव्यसनमप्रतिकार्यं चेत् पश्येत्, हीनोऽप्यभियायात् । (६) अप्रतिकार्यासन्नव्यसनो वा ज्यायानपि संश्रयेत । सन्धिनैकतो विग्रहेणैकतश्चेत् कार्यसिद्धिं पश्येत्, ज्यायानपि द्वैधीभूतस्तिष्ठेदिति ।
(१) यदि हीन शक्ति राजा प्रत्येक विषय में नम्र ही बना रहे तो उससे सन्धि कर लेनी चाहिए । क्योंकि दुःख और अमर्ष से पैदा हुआ तेज जंगल में लगी हुई आग के समान है; बहुत संभव है कि विजिगीषु के सन्धि न करने पर हीन शक्ति राजा का तेज उसको विक्रमशाली बना दे और उस दशा में वह मण्डल का कृपापात्र बन जाय ।
(२) यदि हीनशक्ति राजा सन्धि कर देने पर भी यह देखे कि ‘शत्रु के अमात्य आदि प्रकृतिजन अपनी नीचता या असन्तोष के कारण या बदला लिये जाने के भय से मुझे नहीं अपना रहे हैं’ तो विग्रह कर दे ।
(३) अधिक बलसम्पन्न विजिगीषु, हीनशक्ति राजा के साथ विग्रह करने पर यदि देखे कि ‘अमात्य आदि प्रकृतिजन लोभी, क्षीण तथा चरित्रहीन होने के कारण अथवा विग्रह से उद्विग्न होने के कारण मुझसे अनुराग नहीं रखते’ तो सन्धि कर ले । या विग्रह से पैदा हुई उद्विग्नता को वह शान्त करे । अथवा जब देखे कि ‘मेरे ऊपर भी आपत्ति है और शत्रु के ऊपर भी; मेरी आपत्ति बहुत बड़ी है और शत्रु की बहुत थोड़ी; वह सुगमता से अपनी आपत्ति का प्रतीकार करके मेरा मुकाबला करने के लिए तैयार हो जायेगा’ तो शक्तिहीन के साथ भी सन्धि कर ले ।
(४) यदि अधिक शक्तिशाली विजिगीषु भी यह समझे कि ‘सन्धि या विग्रह करने पर शत्रु का ह्रास और मेरी वृद्धि संभव न होगी’ तो आसन का आश्रय ले ।
(५) यदि हीनशक्ति विजिगीषु भी यह देखे कि ‘शत्रु अपनी आपत्ति का प्रती-कार करने में असमर्थ है’ तो तत्काल ही उस पर चढ़ाई कर दे ।
(६) प्रतीकार से शान्त न होने वाली आपत्ति को समीप आया देखकर अधिक शक्तिसंपन्न विजिगीषु को भी चाहिए कि वह संश्रयवृत्ति का अवलम्बन करे । यदि