भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १०१-१०२ : अ० ३ ] शक्ति के अनुसार व्यवहार ४६३

(१) एवं समस्य षाड्गुण्योपयोगः । तत्र तु प्रतिविशेषः— (२) प्रवृत्तचक्रेणाक्रान्तो राज्ञा बलवताबलः । सन्धिनापनमेत्तूर्णं कोशदण्डात्मभूमिभिः ॥ (३) स्वयं संख्यातदण्डेन दण्डस्य विभवेन वा । उपस्थातव्यमित्येष सन्धिरात्मामिषो मतः ॥ (४) सेनापतिकुमाराभ्यामुपस्थातव्यमित्ययम् । पुरुषान्तरसन्धिः स्यान्नात्मनेत्यात्मरक्षणः ॥ (५) एकेनान्यत्र यातव्यं स्वयं दण्डेन वेत्ययम् । अदृष्टपुरुषः सन्धिर्दण्डमुख्यात्मरक्षणः ॥ (६) मुख्यस्त्रीबन्धनं कुर्यात् पूर्वयोः पश्चिमे त्वरिम् । साधयेद् गूढमित्येते दण्डोपनतसन्धयः ॥ (७) कोशदानेन शेषाणां प्रकृतीनां विमोक्षणम् ।


एक के साथ सन्धि द्वारा और दूसरे के साथ विग्रह द्वारा अपनी कार्यसिद्धि समझे तो अधिक शक्तिशाली विजिगीषु द्वैधीभाव का अवलम्बन करे ।

( १ ) इस प्रकार सम, हीन और अधिक शक्ति के विजिगीषु राजाओं में पारस्परिक सन्धि आदि छह गुणों के उपयोग का निरूपण किया गया । अब उनमें से हीन शक्ति वाले के प्रति कुछ विशेष बातों का निर्देश किया जाता है ।

( २ ) सेना आदि के द्वारा बलवान् राजा से दबाये हुए निर्बल राजा को चाहिए कि तत्काल वह धन, सेना और भूमि आदि के सहित आत्मसमर्पण करके बलवान् राजा के सामने झुक जाय ।

( ३ ) जब विजित राजा; विजयी राजा के कथनानुसार अपनी शक्तिभर सेना तथा धन लेकर आत्मसमर्पण कर दे तो उस संधि को आमिषसन्धि कहते हैं ।

( ४ ) सेनापति और राजकुमार को शत्रुराजा की सेवा में पेश करके जो संधि की जाती है । उसको पुरुषांतर संधि कहते हैं । इसी को आत्मरक्षण संधि भी कहते हैं, क्योंकि इसमें राजा शत्रु के दरबार में न जाने से आत्मरक्षा कर लेता है ।

( ५ ) शत्रु के कार्य की सिद्धि के लिए जब 'मैं स्वयं अकेला ही जाऊँगा या मेरी सेना ही जायेगी' ऐसा कहकर संधि की जाती है तब उसे अदृष्टपुरुषसंधि कहते हैं । इस संधि को दण्डमुख्यात्मरक्षण संधि भी कहते हैं, क्योंकि इसमें मुख्य सैनिकों और राजा की रक्षा हो जाती है ।

( ६ ) उक्त तीनों संधियों में से पहिली दो संधियों में विश्वास के लिए शक्तिशाली राजा प्रमुख राजपुरुषों की कन्याओं से विवाह करे और तीसरी संधि में शत्रु को विष आदि गूढ प्रयोगों के द्वारा वश में करे । इन तीनों संधियों का एक नाम दण्डोपनतसंधि है ।

( ७ ) जिस संधि में बलवान् शत्रु द्वारा युद्ध में गिरफ्तार किये गये अमात्य