कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवां अधिकरण |
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परिक्रयो भवेत् सन्धिः स एव च यथासुखम् ॥
(१) स्कन्धोपनेयो बहुधा ज्ञेयः सन्धिरुपग्रहः ।
निरुद्धो देशकालाभ्यामत्ययः स्यादुपग्रहः ॥
विषह्यदानादायत्यां क्षमः स्त्रीबन्धनादपि ।
सुवर्णसन्धिविश्वासादेकीभावगतो भवेत् ॥
(२) विपरीतः कपालः स्यादत्यादानादभाषितः ।
पूर्वयोः प्रणयेत् कुप्यं हस्त्यश्वं वा गरान्वितम् ॥
(३) तृतीये प्रणयेदधं कथयन् कर्मणां क्षयम् ।
तिष्ठेच्चतुर्थ इत्येते कोशोपनतसन्धयः ॥
(४) भूम्येकदेशत्यागेन देशप्रकृतिरक्षणम् ।
आदिष्टसन्धित्रेष्टो गूढस्तेनोपघातिनः ॥
आदि प्रकृतिजनों को धन देकर छुड़ाया जाय उसे परिक्रयसन्धि कहते हैं। और यही संधि जब सुविधानुसार किस्तवार धन अदा करने की शर्त पर की जाय तो उपग्रह-सन्धि कहाती है। जब किस्तवार देय धन के लिए समय और स्थान निश्चित किये जाते हैं तब इसी उपग्रहसन्धि को प्रत्ययसन्धि कहते हैं।
( १ ) सुविधानुसार नियत समय में नियमित धन राशि दे देने के कारण यह संधि कन्यादानसंधि के नाम से भी कहीं कहीं प्रसिद्ध है, क्योंकि यह सन्धि भविष्य में अच्छा फल देनेवाली एवं तपे हुए सुवर्ण को आपस में मिला देने के समान शत्रु और विजिगीषु को मिलाने का साधन सिद्ध होती है। इसलिए इसका एक नाम सुवर्ण सन्धि भी दिया गया है।
( २ ) जिस सन्धि में संपूर्ण धनराशि तत्काल ही अदा कर देने की शर्त होती है उसकी कपालसन्धि कहते हैं। शास्त्रों में इस दुरभिसन्धि को कोई स्थान नहीं दिया गया है। उक्त चार सन्धियों में से पहिली दो सन्धियों में कपड़ा, कवच, लोहा; तांबा आदि वस्तुएँ शत्रु राजा को दे, या उसके इच्छानुसार बूढ़े हाथी-घोड़े पेश करे, किन्तु उनको ऐसा विष दिया गया हो, जिससे दो-तीन दिनों के भीतर उनकी मृत्यु हो जाय।
( ३ ) तीसरी सन्धि में देय धन का कुछ हिस्सा देकर कह दे कि 'आजकल मेरे कार्य बहुत बिगड़ गये हैं, इतने ही पर सन्तोष कीजिए'। चौथी कपालिक सन्धि में मध्यम या उदासीन राजा का आश्रय लेकर 'देता हूँ' 'देता हूँ' कहता हुआ समय को टाल दे। इन चारों सन्धियों का एक नाम कोशोपनतसन्धि भी कहा जाता है
( ४ ) राष्ट्र और प्रकृति की रक्षा के लिए भूमि का कुछ भाग देकर जो सन्धि की जाती है उसे आदिष्टसन्धि कहते हैं। जो विजिगीषु उस दी हुई भूमि में गूढ पुरुषों और चोरों के द्वारा उपद्रव करने में समर्थ हो उसके लिए यह सन्धि बड़े मौके की है।