भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण १०३-१०७विगृह्यासनं, सन्धायासनं, विगृह्ययानं, सन्ध्याययानं, सम्भूयप्रयाणं च
अध्याय ४

(१) सन्धिविग्रहयोरासनं यानं च व्याख्यातम् । स्थानमासनमुपेक्षणं चेत्यासनपर्यायाः । (२) विशेषस्तु गुणैकदेशे स्थानम् । स्ववृद्धिप्राप्त्यर्थमासनम् । उपायानामप्रयोग उपेक्षणमिति । (३) सन्धानकामयोररिविजिगीष्वोरुपहन्तुमशक्तयोर्विगृह्यासनं सन्धाय वा । (४) यदा वा पश्येत्—'स्वदण्डैर्मित्राटवीदण्डैर्वा समं ज्यायांसं वा कर्शयितुमुत्सहे' इति, तदा कृतबाह्याभ्यन्तरकृत्यो विगृह्यासीत । (५) यदा वा पश्येत्—'उत्साहयुक्ता मे प्रकृतयः संहता विवृद्धाः स्वकर्मण्यव्याहताश्चरिष्यन्ति, परस्य वा कर्माण्युपहनिष्यन्ति' इति, तदा विगृह्यासीत ।


विग्रह करके आसन और यान का अवलंबन

( १ ) पूर्वाचार्यों ने यान तथा आसन को सन्धि और विग्रह के अन्तर्गत ही माना है । स्थान, आसन और उपेक्षण; ये तीन शब्द आसन के पर्यायवाची हैं ।

( २ ) आसनरूप गुण की अल्पावस्था में स्थान शब्द का प्रयोग रूढ है । आशय यह है कि आसन को ग्रहण करने पर भी यदि शत्रु के अपकार का बदला न चुकाया जा सके ऐसी अवस्था में आसन शब्द के लिए विशेष रूप से स्थान शब्द का प्रयोग किया जाता है । अपनी वृद्धि के लिए जब इस गुण का अवलम्बन किया जाय तो उसे आसन कहते हैं । लड़ते हुए उपायों का प्रयोग न करना अथवा थोड़ा प्रयोग करना उपेक्षण कहलाता है ।

( ३ ) विग्रह करके आसन का अवलम्बन : एक-दूसरे को हानि पहुचाने में असमर्थ सन्धि की इच्छा रखने वाले विजिगीषु और शत्रु राजा को चाहिए कि वे विग्रह करके आसन का अवलम्बन करें या सन्धि करके आसन का अवलम्बन करें ।

( ४ ) अथवा जब विजिगीषु देखे कि 'अपनी तथा मित्र की या आटविक राजा की सेना के द्वारा, मैं बराबर के या अधिक शक्तिवाले शत्रु राजा की सेना को पराजित कर सकूँगा' तो भीतर और बाहर की सब व्यवस्था ठीक करके विग्रह करके चुप होकर बैठ जाय ।

( ५ ) अथवा जब देखे कि 'मेरी अमात्य आदि प्रकृतियाँ पूरे उत्साह पर तथा