कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १०३-१०७ : अ० ४ ] आसन और यान का प्रयोग ४६७
(१) यदा वा पश्येत्—'परस्यापचरिताः क्षीणा लुब्धाः स्वचक्रस्तेनाट- वीव्यथिता वा प्रकृतयः स्वयमुपजापेन वा मामेष्यन्तीति, सम्पन्ना मे वार्ता विपन्ना परस्य तस्य प्रकृतयो दुर्भिक्षोपहता मामेष्यन्ति, विपन्ना मे वार्ता सम्पन्ना परस्य तं मे प्रकृतयो न गमिष्यन्ति विगृह्य चास्य धान्यपशुहिर- ण्यान्याहरिष्यामि, स्वपण्योपघातीति वा परपण्यानि निवर्तयिष्यामि, पर- वणिक्पथाद्वा सारवन्ति मामेष्यन्ति विगृहीते नेतरं, दूष्यामित्राटवीनिग्रहं वा विगृहीतो न करिष्यति, तैरेव वा विग्रहं प्राप्स्यति, मित्रं मे मित्रभाव्य- भिप्रयातो बह्वल्पकालं तनुक्षयव्ययमर्थं प्राप्स्यति, गुणवतीमादेयां वा भूमिं सर्वसन्दोहेन वा मामनादृत्य प्रयातुकामः कथं न यायात्' इति परवृद्धिप्रति घातार्थं प्रतापार्थं च विगृह्यासीत । (२) तमेव हि प्रत्यावृत्तो ग्रसत इत्याचार्याः ।
पूरे सङ्गठन पर है; वे उन्नति पर हैं तथा निर्विरोध अपने कर्मों की रक्षा और शत्रु के कर्मों को ध्वस्त कर सकेंगी' तो युद्ध की घोषणा कर चुप बैठ जाय ।
(१) अथवा जब देखे कि 'शत्रु का प्रकृति मण्डल तिरस्कृत, क्षीण, लोभी, पारस्परिक कलह से पीडित होने से भेद उपायों द्वारा या स्वयमेव मेरे वश में हो जायेगा । मेरा कृषि, वाणिज्य सुधार पर तथा शत्रु के बिगाड़ पर हैं, उसका सारा प्रकृति-मण्डल दुर्भिक्ष से पीडित होकर मेरे पक्ष में हो जायेगा । अथवा शत्रु की वार्ता समृद्ध और मेरी क्षीणावस्था में है । फिर भी मेरा प्रकृतिमण्डल शत्रु के पक्ष में न जायेगा, बल्कि विग्रह करके मैं शत्रु के धन-धान्य, पशु, हिरण्य आदि नष्ट कर सकूँगा । अथवा विग्रह करके मैं अपने पण्य ( व्यापार ) को हानि पहुँचाने वाले शत्रु के पण्य को अपने देश में आने से रोक दूँगा । या विग्रह करके शत्रु के व्यापारी मार्गों से हाथी, घोड़े आदि सारवान् वस्तुएँ मेरे पास चली आवेंगी और मेरी वे वस्तुएँ शत्रु के पास न जा सकेंगी । या विग्रह करके शत्रु अपने दूष्य शत्रु और आटविकों को वश में न कर सकेगा । या उनके साथ भी इसका विग्रह हो जायेगा । अथवा विग्रह के द्वारा शत्रु के कार्यों में रुकावट डालकर मैं अपने मित्र राजा का थोड़े ही समय में इतना अधिक उपकार कर सकूँगा कि वह धन-धान्य से सम्पन्न हो जायेगा । अथवा इस प्रकार मेरे द्वारा अनादृत यह शत्रु राजा अत्यन्त उपजाऊ एवं उपयोगी भूमि को लेने के लिए कहीं अपनी सम्पूर्ण सेना को लेकर आक्रमण न कर दे'—इत्यादि अवस्थाओं में विजिगीषु को चाहिए कि वह अपनी अभ्युन्नति और शत्रु की हानि के लिए विग्रह करके आसन का अवलम्बन करे ।
(२) पूर्वाचार्यों का इस संबंध में यह सुझाव है कि 'विजिगीषु द्वारा आक्रमणकारी शत्रु के मार्ग में बाधा पड़ जाने के कारण कहीं ऐसा न हो कि वह कुपित होकर विजिगीषु के ऊपर ही टूट पड़े और उसका उन्मूलन कर दे । इससे तो भारी अनर्थ की सम्भावना है । इसलिए ऐसी अवस्था में उचित यह है कि विग्रह करके चुप न बैठ जाय ।'