भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 554
प्रकरण १०८-११० <br> अध्याय ५## यातव्यामित्रयोरभिग्रहचिन्ता, <br> क्षयलोभविरागहेतवः, <br> प्रकृतीनां सामवायिकविपरिमर्शश्च

(१) तुल्यसामन्तव्यसने यातव्यममित्रं वेत्यमित्रमभियायात्, तत्सिद्धौ यातव्यम्। अमित्रसिद्धौ स यातव्यः साहाय्यं दद्यान्नामित्रो यातव्यसिद्धौ। (२) गुरुव्यसनं यातव्यं, लघुव्यसनममित्रं वेति गुरुव्यसनं सौकर्यतो यायादित्याचार्याः। नेति कौटिल्यः—लघुव्यसनममित्रं यायात्। लघ्वपि हि व्यसनमभियुक्तस्य कृच्छ्रं भवति। सत्यं गुर्वपि गुरुतरं भवति। अनभियुक्तस्तु लघुव्यसनः सुखेन व्यसनं प्रतिकृत्यामित्रो यातव्यमभिसरेत्। पाष्णिं गृह्णीयात्।


यानसंबंधी विचार : प्रकृतिमंडल के क्षय, लोभ तथा विराग के हेतु और सहयोगी सामवायिकों का हिस्सा

(१) विजिगीषु राजा को चाहिए कि यातव्य और शत्रु के ऊपर सामन्त आदि से उत्पन्न समान व्यसन आ पड़ा हो तो, ऐसी स्थिति में, पहिले शत्रु पर चढ़ाई की जाय। उसको जीत लेने के बाद फिर यातव्य पर आक्रमण किया जाय। क्योंकि शत्रु को जीत लेने पर यातव्य, विजिगीषु का सहायक हो सकता है; किन्तु यातव्य को जीत लेने पर शत्रु कभी भी सहायक नहीं हो सकता; उसका कारण यह है कि शत्रु हमेशा ही अपकार करने वाला होता है।

(२) यानसंबंधी विचार : यदि विजिगीषु के समक्ष 'अधिक व्यसन में फँसे हुए यातव्य पर पहिले चढ़ाई की जाय या थोड़े व्यसन में फँसे हुए शत्रु पर पहिले चढ़ाई की जाय' ऐसी विकल्प की स्थिति आये तो उसको उचित है कि अधिक व्यसनी यातव्य पर ही पहिले वह चढ़ाई करे, क्योंकि उसको जीत लेना अधिक सुगम होता है'—ऐसा पूर्वाचार्यों का अभिमत है। किन्तु आचार्य कौटिल्य इस अभिमत से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि 'पहिले शत्रु पर ही चढ़ाई करनी चाहिए, भले ही उस पर थोड़ी विपत्ति क्यों न हो; क्योंकि आक्रमण की स्थिति में छोटे व्यसन का प्रतीकार करना भी कठिन हो जाता है। यद्यपि यातव्य का गुरु व्यसन चढ़ाई कर देने पर अधिक गुरुतर हो जायेगा और उसको जीत लेना अत्यन्त ही सरल हो जायेगा; तथापि